जन्म: 23 सितंबर 1908, सिमरिया (बेगूसराय), बिहार
मृत्यु: 24 अप्रैल 1974
शिक्षा: बी.ए. (पटना विश्वविद्यालय) — दर्शन, राजनीति, इतिहास
भाषाएँ: संस्कृत, उर्दू, बंगाली, अंग्रेजी और अन्य
साहित्यिक योगदान: वीर रस के प्रमुख कवि; राष्ट्रवादी चेतना जगाई।
प्रमुख रचनाएँ: 'रेणुका', 'हुंकार', 'कुरुक्षेत्र', 'रसवंती',
एक बार की बात है, बिहार के सिमरिया गाँव में एक साधारण किसान परिवार में एक बालक का जन्म हुआ। पिता की मृत्यु बहुत छोटी उम्र में हो गई, परंतु माँ ने उसे संस्कार और शिक्षा का महत्त्व समझाया। वह बालक था — रामधारी सिंह दिनकर।
गरीबी इतनी थी कि पढ़ाई के लिए किताबें खरीदना भी कठिन होता था, पर दिनकर जी ज्ञान के प्यासे थे। वे दूसरों से किताबें माँगकर पढ़ते और रात में दीपक की मंद रोशनी में देर तक अध्ययन करते।
उनका मन इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रभक्ति से भरा था। जब भारत पर अंग्रेजों का शासन था, तब दिनकर जी की लेखनी ने क्रांति की आग जलाई।
उनकी कविताओं में वीर रस, देशभक्ति और गौरव की भावना इतनी प्रखर थी कि उन्हें “राष्ट्रकवि” कहा जाने लगा।
उनकी कविता “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” ने आज़ादी के समय जन-जन में जोश भर दिया।
हुआ नरों में देवता जब भोग में लीन,
बस गया स्वर्ग तब धरती पर, हुई दीन।
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है!
अब न तख़्त पर कोई राजा रहेगा,
अब न मुकुट पर किसी का हक़ रहेगा,
जनता की अपनी शक्ति अब जाग उठी है,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है!
इस कविता में दिनकर जी ने अंग्रेज़ी शासन और अत्याचारों के ख़िलाफ़ जनता की जागृति और क्रांति की भावना को आवाज़ दी।
वे कहते हैं कि अब राजाओं या शासकों का नहीं, बल्कि जनता का युग है।
यह कविता आज़ादी के समय जनता की चेतना का प्रतीक बन गई थी — जिसने लाखों युवाओं में जोश और साहस भर दिया।
दिनकर जी का जीवन और रचनाएँ हमें सिखाती हैं कि –
देशभक्ति केवल शब्द नहीं, बल्कि एक कर्म है।
साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का माध्यम है।
सच्चा कवि वही है जो अपने शब्दों से अंधकार में भी प्रकाश की किरण जला दे।
बिहार के सिमरिया गाँव में एक गरीब किसान परिवार में दिनकर जी का जन्म हुआ।
छोटी उम्र में ही पिता का साया सिर से उठ गया, पर माँ ने उन्हें शिक्षा और संस्कार का महत्त्व समझाया।
कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी —
वे दूसरों से किताबें उधार लेकर पढ़ते और दीपक की कमजोर रोशनी में पूरी रात अध्ययन करते।
उनकी लेखनी में आत्मविश्वास, राष्ट्रभक्ति और सत्य का बल झलकता था।
अंग्रेज़ी शासन के समय उन्होंने अपने शब्दों से जनता के मन में क्रांति की अग्नि प्रज्वलित की।
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी का जीवन हमें यह सिखाता है कि —
“संघर्ष से बड़ा कोई शिक्षक नहीं होता।”
उन्होंने गरीबी को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी ताकत बनाया।
उनकी कविताएँ आज भी हमारे भीतर देशप्रेम, साहस और आत्मविश्वास की ज्योति जलाती हैं।
यदि आपको यह लेख प्रेरक लगा हो,
तो नीचे ‘जय दिनकर!’ लिखकर इस महान कवि को नमन करें।
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🌸 जय भारत, जय दिनकर! 🌸
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Thanks for reading: रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हिंदी साहित्य के वो तेजस्वी सूर्य हैं, Sorry, my English is bad:)