01. संविधान एक लिखित दस्तावेज के रूप में होता है जिसमें राज्य के बारे में कई प्रधान होते हैं यह प्रावधान बताते हैं कि राज्य का गठन कैसे होगा और वह किन सिद्धांतों को पालन करेगा अर्थात यह वही दस्तावेज है
जो राज्य के समस्त अंगों (विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका) को शक्तियां प्रदान करता है इन तीनों को संविधान की मर्यादाओं में रहकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना होता है
इस तरह से जब हम किसी देश के संविधान की बात करते हैं तो सामान्य रूप से इसी दस्तावेज का जिक्र कर रहे होते हैं।
संविधान बनाने वाली सभा जिसे संविधान सभा कहते हैं की पहली बैठक 9 दिसंबर सन 1946 को हुई थी डॉ राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष थे
संविधान सभा ने डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता में एक प्रारूप समिति का गठन किया संविधान का प्रारूप तैयार करने में लगभग 3 वर्ष लगे
नया संविधान संविधान सभा द्वारा 26 नवंबर 1949 को अपनाया गया और 26 जनवरी 1950 को पूर्ण रूप से लागू हुआ जिसे हम प्रतिवर्ष गणतंत्र दिवस के रूप में बनाते हैं।
'सविधान'नामक दस्तावेज सरकार की शक्तियों पर अंकुश रखकर एक ऐसी प्रजातांत्रिक व्यवस्था की स्थापना करती है। जिसमें सभी व्यक्तियों को कुछ अधिकार प्राप्त होते हैं।
संविधान में उन अधिकारों को सूची बंद किया गया जिन्हें सुरक्षा देनी थी। और उन्हें'मौलिक अधिकारों' की संज्ञा दी गई मौलिक अधिकार इतने महत्वपूर्ण हैं।
कि संविधान स्वयं या निश्चित करता है कि सरकार भी उसका उल्लंघन ना कर सके ।।।
१) समानता का अधिकार
संविधान की प्रस्तावना में समानता के बारे में दो बातों का उल्लेख है-
1. प्रतिष्ठा की समानता 2. अवसर की समानता ।
'समता का अधिकार'का अर्थ है कि देश में कानून के समक्ष सभी नागरिक समान हैं। अर्थात हमारे देश का कानून, धर्म, लिंग, जाति, रंग, और मत के आधार पर कोई भेद भाव नहीं करता ।
किसी को भी सार्वजनिक स्थलों-जैसे अस्पताल, दुकान, होटल, कुवा, पनघट, स्कूल,-कॉलेज, मंदिर, दर्शनीय स्थल, इमारतों, पर्यटन, स्थल में प्रवेश एवं इस्तेमाल करने से नहीं रोका जा सकता है।
संविधान ने अस्पृश्यता को समाप्त कर दिया है। अस्पृश्यता, कानून द्वारा दंडनीय अपराध है।
उदाहरण ---- यदि किसी पूंजीपति या कुलीन को किसी अपराध का दोषी पाया जाता है तो उसे वही दंड दिया जाता है जो सामान्य व्यक्ति को दिया जाता है
कोई भी व्यक्ति अपने पद दिया पृष्ठभूमि के कारण विशेष व्यवहार का दावा नहीं कर सकता।
2. स्वतंत्रता का अधिकार
स्वतंत्रता का अर्थ है चिंतन अभिव्यक्ति और कार्य करने की स्वतंत्रता। स्वतंत्रता का अर्थ नहीं है,
कि हम जैसा चाहे वैसा करने लगे अंत स्वतंत्रता को इस प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है कि बिना किसी स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचाए कानून व्यवस्था को बिना ठेस पहुंचाए
प्रत्येक व्यक्ति अपनी अपनी स्वतंत्रता का आनंद ले सकें।
स्वतंत्रता का अधिकार भारतीय नागरिकों को छह: आधारभूत स्वतंत्रता की ग्रारंटी देता है।
इन अधिकारों के आंतरिक शिक्षा के अधिकार सहित प्राण तथा दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण का अधिकार भी है संवैधानिक नियमावली के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र हैं
लेकिन कुछ परिस्थितियों में प्रदत्त सफलता पर कुछ प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं जो कि असीमित सुनता अव्यवस्था को जन्म देती है
इसलिए राज्य को इन अधिकारों को रोक लगाने की शक्ति प्राप्त है।
3. शोषण के विरुद्ध अधिकार
शोषण का अर्थ होता है। किसी व्यक्ति की मजबूरी का गलत फायदा उठाना, जैसे उसकी मेहनत की उचित मजदूरी ना देना, शोषण के विरुद्ध अधिकार महिलाओं बच्चों और गरीबों को शोषण से बचाने का लक्ष्य रखता है।
हमारा संविधान मनुष्य के खरीदने और बेचने पर प्रतिबंध लगाता है। बेकार तथा बंधुआ मजदूरी पर भी प्रतिबंध है।
संविधान भी कहता है कि 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखानों, खदानों, और अन्य खतरनाक जगहों, पर काम में नहीं लगाना चाहिए।
अंत: या आवश्यक है कि सरकार इस प्रकार के सोशल को रोके।
4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
भारत के संविधान के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपनी पसंद के धर्म का पालन करने का अधिकार है
भारत एक पंथनिरपेक्ष देश से प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म के अनुसार पूजा, उपासना और प्रचार करने का अधिकार है। सरकार के लिए सभी धर्म बराबर हैं।
और किसी भी धर्म को किसी दूसरे धर्म से अधिक वरीयता नहीं दी जाएगी!
5. संस्कृति और शिक्षा का अधिकार
हमारा संविधान मानता है कि 'विविधता' हमारे समाज की मजबूती है अल्पसंख्यकों को अपनी संस्कृति बनाए रखने का मौलिक अधिकार प्राप्त है।
भाषाई आधार मिक अल्पसंख्यक समुदाय को अपनी भाषा लिपि और संस्कृति की रक्षा करने का अधिकार है। साथियों शैक्षिक संस्थाएं स्थापित और संचालित कर सकते हैं।
शिक्षण संस्थाओं को वित्तीय अनुदान देने के मामले में भी सरकार भेदभाव नहीं करेगी।
6.संवैधानिक उपचारों का अधिकार
नागरिकों को अधिकार देना ही पर्याप्त नहीं है यह देखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है
कि सरकार हमारे अधिकारों की रक्षा और सम्मान करें यदि किसी नागरिक को मौलिक अधिकार नहीं दिए जाते हैं बिना किसी कारण सरकार उसके विरुद्ध शक्ति का अन्याय पुर प्रयोग करती है
तो ऐसी स्थिति में सविधान प्रत्येक व्यक्ति को या दिखा देता है कि वह अपने अधिकारों को लागू करवाने के लिए उच्च न्यायालय उच्चतम न्यायालय जा सकता हैं।
भारतीय नागरिक के रूप में हमें अपने संविधान का पालन करना चाहिए देश की रक्षा करनी चाहिए। देशभक्ति की भावना को लोगों में बनाना चाहिए।
सभी नागरिकों में भाईचारा बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए। तथा देश की सुदृढ़ता में प्रत्येक नागरिक की सहभागिता को व्यक्तिगत रुप से नागरिकों को स्वर अनुशासन की निश्चित मानकों का पालन तथा दूसरों के अधिकारों का आदर करना चाहिए।
यह 10 मौलिक कर्तव्य हम सब को एकता के सूत्र में बांधने वाले 10 आदेश हैं हमें अनुभव करना चाहिए कि जहां हमारे पास कुछ पद जी अधिकार हैं
वहीं दूसरी ओर देश के प्रति हमारे कुछ कर्तव्य और दायित्व भी है।
4. नीति निर्देशक तत्व
हमारे संविधान निर्माताओं को ज्ञात होता कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की प्राप्ति प्राप्त नहीं थी आर्थिक असमानता ओं सामाजिक भेदभाव, गरीबी, अशिक्षा, और बेरोजगारी, से मुक्ति और सबका कल्याण करना सबसे बड़ी चुनौती थी।
इसलिए उन लोगों ने सोचा कि राजनीतिक आर्थिक और सामाजिक स्थिति में सुधार लाने के लिए कुछ नीतिगत निर्देश जरूरी हैं।
इसलिए सविधान में कुछ मार्गदर्शक बातें भी शामिल की गई। इन मार्गदर्शक बिंदुओं को नीति निर्देशक सिद्धांत कहते हैं। वास्तव में यह संविधान द्वारा केंद्र तथा राज्य सरकार को दिए गए निर्देशों के नीति
निर्देशक सिद्धांत सरकार को लोगों के कल्याण तथा देश की सामाजिक और आर्थिक समृद्धि हेतु कार्य करने का निर्देश देते हैं।
इसमें भारत को एक—
✔ सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न (Sovereign)
देश फैसले खुद लेता है।
✔ समाजवादी (Socialist)
समान अवसर, सामाजिक न्याय।
✔ पंथनिरपेक्ष (Secular)
हर धर्म का सम्मान।
✔ लोकतांत्रिक (Democratic)
जनता सर्वोच्च। ✔ गणराज्य (Republic)
राष्ट्राध्यक्ष जनता द्वारा चुना जाता है।
उद्देशिका के लक्ष्य:
न्याय → सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक
स्वतंत्रता → विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म, उपासना
समानता → सभी के लिए
बंधुता → भाईचारा, व्यक्ति की गरिमा
🛡️ 2. मौलिक अधिकार (Fundamental Rights)
ये अधिकार किसी कंपनी के “Employee Rights Manual” जैसे—जो जनता को शक्ति देते हैं।
(1) समानता का अधिकार — अनुच्छेद 14–18
सबके लिए समान कानून छुआछूत और भेदभाव निषिद्ध
(2) स्वतंत्रता का अधिकार — अनुच्छेद 19–22
बोलने-लिखने की आज़ादी कहीं आने-जाने की स्वतंत्रता पेशा चुनने का अधिकार गिरफ्तारी से सुरक्षा
(3) शोषण के विरुद्ध अधिकार — अनुच्छेद 23–24
मानव तस्करी, जबरन मजदूरी निषिद्ध बच्चों से कारखानों में काम कराना मना
(4) धर्म की स्वतंत्रता — अनुच्छेद 25–28
कोई भी धर्म मानो या न मानो धार्मिक संस्थाएँ चलाने की आज़ादी
(5) सांस्कृतिक व शैक्षिक अधिकार — अनुच्छेद 29–30
अपनी भाषा-संस्कृति बचाने का अधिकार अल्पसंख्यकों के लिए शिक्षा संस्थाएँ खोलने का अधिकार
→ “अधिकार टूटे तो कोर्ट जाओ” वाला पावर। डॉ. आंबेडकर ने इसे संविधान की आत्मा कहा है।
नागरिकों की जिम्मेदारियाँ — जैसे कंपनी की “Code of Conduct”। अनुच्छेद 51A के तहत कुल 11 कर्तव्य:
प्रमुख कर्तव्य:
संविधान का पालन देश की अखंडता बनाए रखना देश की रक्षा करना महिला सम्मान का ध्यान
पर्यावरण-संरक्षण
सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा टैक्स व कानून का सम्मान वैज्ञानिक सोच बढ़ाना राष्ट्रीय प्रतीकों का आदर
ये सरकार के लिए Guidelines हैं—कंपनी की “Long-term Strategy Plan” की तरह। अनुच्छेद 36–51 के बीच।
लक्ष्य:
सामाजिक और आर्थिक न्याय समान अवसर
गरीबों के लिए कल्याणकारी नीतियाँ शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार
अंतर्राष्ट्रीय शांति पर्यावरण संरक्षण
1. सामाजिकवादी सिद्धांत
– गरीबों के लिए भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य
2. उदारवादी सिद्धांत
– समान नागरिक संहिता, न्यायिक सुधार
3. गांधीवादी सिद्धांत
– ग्राम पंचायत, खादी, शराबबंदी, किसान-उद्योग
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Thanks for reading: संविधान निर्माण उद्देशिका मौलिक अधिकार मौलिक कर्तव्य और नीति निर्देशक तत्वों की जानकारियां | Constitution -making Families Fundamental Rights Fundamental Duties and Directive Elements, Sorry, my English is bad:)