प्राचीन काल में गुरु की अवधारणा
प्राचीन भारत में शिक्षा की गुरुकुल प्रणाली थी। एक निश्चित अध्ययन अवधि के लिएविद्यार्थी को गुरु के साथ रहना पड़ता था। गुरु का आश्रम एक प्रकार का बोर्डिंग विद्यालयहोता था। प्रत्येक विद्यार्थी, चाहे वह निर्धन हो अथवा धनवान या किस उच्च घराने सेसंबंध रखता हो, को एक साथ रहना पड़ता था, सभी के साथ एक जैसा (पक्षपात रहित)व्यवहार किया जाता था। आपको स्मरण होगा कि कृष्ण और सुदामा दोनों एक साथगुरुकुल में रहते थे। गुरुकुल में शिक्षा निशुल्क थी परंतु गुरुकुल को चलाने के लिए सभीमिक्षा (माधुकरी) के रूप में माँगनी पड़ती थी जिससे उनमें विनम्रता तथा विद्यार्थ के रूपमें उनकी सहायता करने के लिए समाज के प्रति कृतज्ञता जैसे गुणों का विकास होता था।इससे जाति क्रम परंपरा को कम करने में सहायता मिलती थी क्योंकि गुरुकुल में सभी विद्यार्थियों को समान समझा जाता था।
गुरु गुरुकुल का मुखिया होता था जो सभी विद्यार्थियों के लिए पिता समान, माता-पिता यासंरक्षक के समान व्यवहार करता था। वह विद्यार्थियों को उनसे बिना किसी अपेक्षा के शिक्षाप्रदान करता था। गुरु के लिए शुल्क लेना वर्जित या निषिद्ध था। विद्यादान उसकी दृष्टिमें सर्वोत्तम दान समझा जाता था और ज्ञान के बेचने का विचार निंदनीय समझा जाता था।गुरुकुल चलाने के लिए राजाओं, तोकोपकारक (परोपकारी व्यक्ति) तथा समाज के धनाड्यवर्ग दान देते थे। गुरु-दक्षेणा के फलस्वरूप भी कुछ सहायता मिल जाती थी जो विद्यार्थीअपनी शिक्षा प्राप्ति के अंत में गुरुकुल छोड़ते समय गुरुकुल को अपनी श्रद्धा समानसहायता देिते थे। इतना कुछ गुरुकुल चलाने के लिए पयाप्त समझा जाता था, क्योंकि गुरुकुल में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति संयम तथा तप का जीवन व्यतीत करता था तथा उन्हें धन संग्रहण की अनुमति नहीं थी।
गुरु के रूप में केवल उसी व्यक्ति की पहचान, नियूक्ति, तथा आदर होता था जो वास्तवमें एक विद्वान एक उत्कृष्ट विशेषज्ञ, तथा आध्यात्मिक रूप से प्रबुद्ध व्यक्ति समझा जाताथा। जैसा आप जानते हैं भारत में बहुत पुरानी गुरु-शिष्य परंपरा रही है। गुरु को उसकीस्वार्थ रहित सेवा के लिए समाज में उसे ऊँचा स्थान दिया जाता था और यहां तक भी किराजा भी गुरु का सम्मान करते थे। गुरु को माता-पिता से भी बढ़कर माना जाता था तथाएक गुरु का दर्जा देवताओं से भी बढ़कर था।
गुरुब्रहमागुरु्वष्णु गुरु देवो महेश्वर
गुरु साक्षात् परं ब्रहम तस्मै श्री गुरु नम
गुरु को हृदय, मस्तिष्क, हाथ, आध्यात्मिकता, ज्ञान तथा विद्वता के अच्छे गु्णों का प्रतीक समझा जाता था। एक सही गुरु अपने जीवन के औंतिम क्षणों तक एक विद्यार्थी (जो हरसमय विद्या का ग्राही हो) होता था। यह हमारे आज के एल-3 (L-3) टीचर की अक्धारणा(Life Long Learner) T4 ŽI 3Ì Guide the side, no 'sage on the stage'समझा जाता था (अर्थात् वह एक साथी के समान मार्ग दर्शक था, न कि मंच पर विराजमानमहात्मा)।
उस समय के गुरु अपने आपमें एक संपूर्ण संस्था के समान होते थे जो अपनी विद्वता तथाबलिदान के लिए जाने जाते थे। भारत में ऐसे गुरु के प्रति सारी दुनिया के विद्यार्थीआकर्षित होते थे और भारत में विद्या ग्रहण करने आते थे। जब विद्यार्थियों की संख्याअधिक हो जाती थी तो गुरु अपने पुराने, वरिष्ठ तथा प्रतिभाशाली शिष्यों को अध्यापन-अधिगम प्रक्रिया में समिलित कर लेते थे। इससे अध्यापक को उसके कार्य में आवश्यक सहायता मिल जाती थी तथा उन पुराने विद्यार्थियों के लिए गुरु के प्रत्यक्ष पर्यवेक्षण मेंअध्यापन के प्रशिक्षण का अवसर प्राप्त हो जाता था जो अध्यापक बनने के इच्छूक होते थे।
मॉनीटर प्रणाली वास्तव में प्राचीन भारतीय शिक्षा का ही योगदान है जिसके अंतर्गत वरिष्ठ विद्यार्थी (जो या तो गुरु पुत्र होते थे अथवा कोई योग्य वरिष्ठ विद्यार्थी ) छोटी कक्षा के विद्यार्थियों को पढ़ाते थे। बाद में मनु काल में जब चातुर्वण्य (वर्ण व्यवस्था) ने एक सामाजिक व्यवस्था का रूप ले लिया तो कोई भी ब्राहमण पुत्र गुरु बनाया जाने लगा चाहे वह विद्वान था अथवा नहीं। पिता अपने पुत्र को एक अध्यापक के रूप में प्रशिक्षित करने लगा और इस प्रकार अध्यापन मात्र ब्राहमणों का पारिवारिक व्यवसाय बन कर रह गया।
प्राचीन भारत में गुरु को विभिन्न प्रकार की भूमिकाएँ संपादित करनी होती थी। वह विद्यार्थियों के लिए माता-पिता की, अध्यापक की, एक विद्वान की, एक धर्म प्रचारक(मिशनरी) की तथा एक मित्र, एक दार्शनिक तथा पथ प्रदर्शक की भूमिका निभाता था।विद्यार्थियों की आवश्यकताओं को व्यक्तिगत रूप से देखभाल करता था। यह देखना गुरुका ही कर्तव्य था कि विद्यार्थी विकास कर रहा है और गुरु तथा स्वयं की संतुष्टि सेप्रगति कर रहा है। अध्यापक और शिष्य में पिता और पुत्र की तरह अत्यंत गहन याआंतरिक संबंध होता था। इस संबंध की उपनिषद में भली भांति व्याख्या की गई है।उपनिषद का शाब्दिक अर्थ है "निकट बैठना"। अध्येता अध्यापक के चरणों में बैठकरविद्यार्जन करता था। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मानियर विलियम द्वारा रचित शब्दकोश के अनुसार "उपनिषद का अर्थ है "परमात्मा के ज्ञान को प्रकटित या उद्घाटित कर अंधकार को दूर भगा देना है।" कठोपनिषद तथा बृहदरणायक उपनिषद पर शंकराचार्य की व्याख्या के अनुसार उपनिषद की विषयवस्तु आत्मविद्या है. अर्थात् आत्म ज्ञान या ब्रहमज्ञान।
अध्यापन विधि गुरु और शिष्य के बीच मौखिक संवाद के रूप में थी। इसके अतिरिक्तव्याख्यान, प्रवचन, वाद -विवाद, तथा विवेचना, सस्वर पठन तथा पुनरावृत्ति विद्यार्थी कीदैनिक नित्यक्रिया के अंग थे। मूल्यांकन सतत् तथा व्यापक रूप से होता था जिसे गुरुसंचालित करता था। औपचारिक रूप से कोई परीक्षा नहीं होती थी, कोई डिग्री यासर्टिफिकेट नहीं दिए जाते थे; केवल दीक्षांत समारोह के समय गुरु यह घोषणा करता था कि अमुक विद्यार्थी ने अनुबद्ध (stipulated) अध्ययन की पूर्ति के पश्चात् स्नातक की उपाधि प्राप्त कर ली है। गुरु उस अर्हता प्राप्त विद्यार्थी को एक विद्वत मंडली के सम्मुख प्रस्तुत करता था जो उससे प्रश्न पूछ सकते थे। अथवा विद्यार्थी को वाद -विवाद के लिए कहा जाता था ताकि वह अपनी योग्यता सिद्ध कर सके। इसमें प्राप्त सफलता के पश्चात विद्यार्थी विषय विशेष में अपने पांडित्य के लिए जाना जाता था और उसे एक विद्वान व्यक्तिके रूप में स्वीकार कर लिया जाता था।
अध्ययन काल में विद्यार्थी की स्वायत्ता को सम्मान दिया जाता था। विद्यारथी अपना गुरुतथा विषय चुनने में स्वतंत्र था। यद्यपि., यह गुरु का विशेषाधिकार माना जाता कि वह किसविद्यार्थी विशेष को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करें या नहीं। आप देख सकते हैं किबौद्ध काल में मठों और मंदिरों में उच्च शिक्षा केन्द्रों के रूप में शैक्षिक संस्थाओं कोऔपचारिक रूप से स्थापित किया गया। सम्राट अशोक के शासनकाल में हिंदु गुरुकुलों केप्रतिपक्ष या पूरक के रूप में इन स्थानों को विशाल प्रतिष्ठानों के रूप में विकसित कियागया। ये आवासी विश्वविद्यालय बन गए, जहाँ अध्यापकों / गुरुओं और विद्यार्थियों के समूह,ज्ञान की खोज में साथ-साथ रहते तथा काम करते थे। वे अपने आपको ज्ञान के सृजन,संक्षण, तथा प्रसारण में व्यस्त रखते थे जो आज के विश्वविद्यालयों के तीन प्रकार्योंअध्यापन, शोध तथा प्रसारण के समान हैं.
गुरुकुल में प्रवेश प्रवेश-परीक्षाओं के माध्यम से होते थे। ये परीक्षाएँ अत्यंत कठिन होती थीऔर उच्च शिक्षा के जाने माने केन्द्रों तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, वल्लभी, नाड़िया,कॉँची, बनारस, इत्यादि स्थानों, पर आयोजित की जाती थी। इन केन्द्रों पर पूरे भारत से तथा विदेशों से भी विद्यार्थी आते थे।
गुरुकुलों की यह विशेषता रही है कि इनमें शिक्षा व्यक्तिगत आधार पर दी जाती थी, एक संस्था के रूप में नहीं। पाठशालाओं की भाँति मध्यकालीन भारत में इस्लामी शिक्षा देने के लिए मस्जिदों में निम्न स्तर की शिक्षा के लिए मकतब तथा उच्च प्रारम्भिक के लिए मदर से स्थापित किए गए। यह इस्लामी शिक्षा जोकि पवित्र कुरान का भाग होता था को मुल्लाओं तथा मौलवियों द्वारा दी जाती थी। यह व्यवस्था उस समय तक चलती रही जब तक भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी आई जिसने बहुत सारे प्रदेशों पर नियंत्रक सत्ताके रूप में अपने आपको स्थापित किया।
यद्यपि, प्राचीन भारतीय शिक्षा के ऐसे बहुत सारे पक्ष हैं जिन्हें आधुनिक शिक्षा में अं्गीकारकिया जा सकता है। तथापि यदि आप आज एक व्यावसायिक अध्यापक बनना चाहते होंतो आपको विभिन्न कौशालों/ गुणों को सीखना पड़ेगा, उनमें प्रवीणता प्राप्त करनी पड़ेगी,उन्हें आत्मसात करना होगा और दूसरे व्यक्तियों के साथ अपनी अन्योन्यक्रिया में निदर्शित करना होगा। ये कुछ गुण निम्नलिखित हो सकते हैं.
प्रभावनीय तथा सकारात्मक सकारात्मक रूप से सोचिए तथा दूसरों को भी सकारात्मक बनने के लिए प्रोत्साहित कीजिए।
अभिव्यक्तिशील दूसरों के साथ विचारों का आदान प्रदान, और प्रभावी संप्रेषण को प्रोत्साहित कीजिए।
एक अच्छा श्रोता विद्यार्थयों की बातों को समानुभूतिपूर्क सुनिए।
विश्वसनीयः दूसरों के साथ कार्य करने में आपका व्यवहार ईमानदार, खुला तथाप्रामाणिक होना चाहिए।
प्रीतिकर व्यवहार: दूसरों के साथ सकारात्मक तथा पारस्परिक कार्य संबंध स्थापितकीजिए तथा उन्हें जारी रखें; वैयक्तिक अन्योन्यक्रिया तथा लगाव के द्वारा विश्वास केवातावरण का निर्माण कीजिए।
व्यवस्थित/ संगठितः योजनाबद्ध तथा क्रमबद्ध तरीके से कार्य करें।
आत्मविश्वासी तथा संतुलित बनिए तथा बच्चों को सकारात्मक आत्म-संप्रत्ययविकसित करने के लिए प्रोत्साहित करें।
अभिप्रेरणात्मकः कुछ मानकों तथा अपेक्षाओं को संजोए हुए, उत्साहित
संवेदनशील / सहानुभूतिशीलः दूसरों को ध्यान रखने वाला, परानुभूतिशील औरभावनात्मक स्तर पर अन्य व्यक्तियों के अनुक्रिया करने में सक्षम अपने विचारों तथाभावनाओं में खुला तथा दूसरों को ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करने वाला।नम्यः दूसरों की सहायतार्थ अपनी योजनाओं और दिशाओं को बदलने में सक्षम ।व्यक्तिगत रूप से अनुभूति क्षमः प्रत्येक बालक को अनुमान व महत्वपूर्ण समझने
वाला।
मुल्य आधारितः मानव की योग्यता तथा सम्मान पर केन्द्रित करने वाला।
समुदाय के मूल्य के प्रति संवेदनशील
सुविज्ञ (जानकार) जो सदैव ज्ञान की खोज में तत्पर हो।
सृजनात्मकः बहुमुखी, नवाचारी, तथा नए विचारों के प्रति प्रभावनीय (Open)सहनशील/ धीरः सदैव वस्तुगत तथा न्यायोचित रहने का प्रयास करने वाला।प्रतिबद्धः विद्यार्थियों तथा अपने व्यवसाय के प्रति
एक सांवृत्तिक अध्यापक को घरमंडी हुए बिना आत्मविश्वासी होना चाहिए। समूह के साथअन्योन्यक्रिया में व्यावसायिक मानक व्यवहार की आवश्यकता होती है जिसमें विनम्रता,दृढ़ता तथा न्याय संगतता होनी चाहिए। सांवृत्तिकता के लिए उपयुक्त तैयारी भी एक अन्य महत्वपूर्ण आवश्यकता होती है। जब आप कक्षा में प्रवेश करें तो आपके पास सभी अपेक्षितसामग्री तथा पाठ योजना तैयार होनी चाहिए। यदि आप पूर्ण तैयारी से कक्षा में नहीं जाते हैं तो इससे बुरा और कुछ नहीं होता।
परिवर्तनशील समाजः आप देखते हैं कि आज सूचना तथा प्रौद्योगिकी की दखल के कारण वैश्विक समाज में विस्मयकारी परिवर्तन हो रहे हैं । आई. सी.टी. हमारे जीवन के
लगभग सभी पक्षों को प्रभावित कर रही है। वर्तमान संदर्भ में, हम कुछ दशकों में एक नईसामाजिक व्यवस्था उभर कर आ रही है। इन परिवर्तनों का कोई पहले उदाहरण नहीं देखागया। प्रौद्योगिकीय विकास या प्रगति इतनी तीव्रता से हो रही है कि यह कल्पना करनासंभव नहीं कि अगले 100 वर्ष के पश्चात हमारा जीवन कैसा होगा? परंतु आअगले 10 या 20वर्षों में जीवन कैसा होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। हम कल के कैसे समाज कीकल्पना कर रहे हैं? इस सामाजिक परिवर्तन के कारण शिक्षा के संप्रत्यात्मक ढाँचे तथाप्रयोजन में कौन से परिवर्तन आ रहे हैं? अध्यापन विधियाँ कैसे बदल रही हैं? क्या आजकी शिक्षा कल के संदर्भ में संगत होगी भी या नहीं? आज के इस परिवर्तित समाज को एकतात्कालिक क्रिया योजना की आवश्यकता है ताकि शिक्षा नई सामाजिक संरचना तथा इस अप्रत्याशित अभूतपूर्व आवश्यकताओं से मेल खा सके।
संयोजित तथा ज्ञानाघारित समाजः जैसा कि उपर्युक्त अनुच्छेद में आपने देखा कि हमारे जीवन को सूचना तथा प्रौद्योगिकी में हुए विकास ने अप्रत्याशित रूप से प्रभावित किया है।आई. सी.टी. उपकरणों तक तकनीकों के व्यापक अनुप्रयोगों ने जीवन में तथा विश्व में एकक्रांति सी ला दी है जिस में शिक्षा भी सम्मलित है। मोबाइल फोन, टेलीविजन, कम्प्यूटर जैसे चमत्कारी उपकरणों से हम क्या क्या कर सकते हैं, अविश्वसनीय सा लगता है। एकओर जहाँ ये अनुप्रयोग संख्या में बढ़ते जा रहे और प्रतिदिन नए-नए क्षेत्रों तक फैलते जारहे हैं, दूसरी ओर वे इतने सस्ते हो रहे हैं कि समाज के पददलित अथवा शोषित वर्ग भी उनका प्रयोग अपने दैनिक जीवन की क्रियाओं में कर रहे हैं। भारत की इतनी बड़ीजनसंख्या में करोड़ों व्यक्ति मोबाइल फोन, टेलीफोन, इंटरनेट तथा कम्प्यूटर पर सोशल नेटवर्क से जुड़ चुके हैं और यह संख्या घातीय रूप से बढ़ रही है।
7.10.2011 को टी आर ए आई की वेबसाइट से प्राप्त सांख्यिकी दर्शाती है कि भारत में इस समय इंटरनेट के उपभोक्ता / प्रयोक्ता 100 मिलियन से भी अधिक है जिनमें 40 मिलियनप्रयोक्ता मोबाइल फोन के माध्यम से इंटरनेट का प्रयोग करते हैं। जुन 2011 के अंत तक भारत में 851.70 मिलियन ग्राहक / उपभोक्ता मोबाइल फोन के थे, 855.99 मिलियन के पासटेलीफोन कनैक्शन थे। प्रति मास मोबाइल फोन उपभोक्ताओं की संख्या 11.41 मिलियनबढ़ जाती है। जब वैश्विक अर्थव्यवस्था में हर चीज महँगी होती जा रही है, एकमात्र वस्तुजो सस्ती है वह है आई सी टी, जबकि इसे उपलब्धता, उपयोगिता, गुणवत्ता, समर्थता, तथा सामाजिक प्रभाविता में प्रतिक्षण सुधार हो रहा है। तथापि, इंटरनेट के साथ कम्प्यूटर कीअधिगम प्रक्रिया में साझेदारी तथा मुख्य योगदान की गति अत्यंत धीमी है। जब सारा विश्व इंटरनेट से जुड़ चुका है हम अभी भी असंबद्ध रूप से या वियोजित रूप से बच्चों को पढ़ा रहे हैं चाहे वह विषयों की विषयवस्तु हो हम समग्र रूप से जीवन के साथ इनका उपयोग नहीं कर पा रहे हैं।
आज की शैक्षिक प्रक्रियाएँ भी आई.सी.टी. अनुप्रयोगों से प्रभावित हो रही हैं । हम देख सकते हैं कि आई. सी. टी. का उपयोग पाठयचर्या विकास में, अध्यापन शैलियों में, अधिगम प्रक्रिया
लगभग सभी पक्षों को प्रभावित कर रही है। वर्तमान संदर्भ में, हम कुछ दशकों में एक नई सामाजिक व्यवस्था उभर कर आ रही है। इन परिवर्तनों का कोई पहले उदाहरण नहीं देखागया। प्रौद्योगिकीय विकास या प्रगति इतनी तीव्रता से हो रही है कि यह कल्पना करनासंभव नहीं कि अगले 100 वर्ष के पश्चात हमारा जीवन कैसा होगा? परंतु आअगले 10 या 20वर्षों में जीवन कैसा होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। हम कल के कैसे समाज की कल्पना कर रहे हैं? इस सामाजिक परिवर्तन के कारण शिक्षा के संप्रत्यात्मक ढाँचे तथा प्रयोजन में कौन से परिवर्तन आ रहे हैं? अध्यापन विधियाँ कैसे बदल रही हैं? क्या आजकी शिक्षा कल के संदर्भ में संगत होगी भी या नहीं? आज के इस परिवर्तित समाज को एकतात्कालिक क्रिया योजना की आवश्यकता है ताकि शिक्षा नई सामाजिक संरचना तथा इस अप्रत्याशित अभूतपूर्व आवश्यकताओं से मेल खा सके।
संयोजित तथा ज्ञानाघारित समाजः जैसा कि उपर्युक्त अनुच्छेद में आपने देखा कि हमारेजीवन को सूचना तथा प्रौद्योगिकी में हुए विकास ने अप्रत्याशित रूप से प्रभावित किया है।आई. सी.टी. उपकरणों तक तकनीकों के व्यापक अनुप्रयोगों ने जीवन में तथा विश्व में एकक्रांति सी ला दी है जिस में शिक्षा भी सम्मलित है। मोबाइल फोन, टेलीविजन, कम्प्यूटरजैसे चमत्कारी उपकरणों से हम क्या क्या कर सकते हैं, अविश्वसनीय सा लगता है। एकओर जहाँ ये अनुप्रयोग संख्या में बढ़ते जा रहे और प्रतिदिन नए-नए क्षेत्रों तक फैलते जारहे हैं, दूसरी ओर वे इतने सस्ते हो रहे हैं कि समाज के पददलित अथवा शोषित वर्ग भीउनका प्रयोग अपने दैनिक जीवन की क्रियाओं में कर रहे हैं। भारत की इतनी बड़ीजनसंख्या में करोड़ों व्यक्ति मोबाइल फोन, टेलीफोन, इंटरनेट तथा कम्प्यूटर पर सोशलनेटवर्क से जुड़ चुके हैं और यह संख्या घातीय रूप से बढ़ रही है।
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