भारत विश्व की सबसे पुरानी
सम्यताओं में से एक है जिसमें बहुरंगी
विविधता और समृद्ध सांस्कृतिक
विरासत है। इसके साथ ही यह अपने-
आप को बदलते समय के साथ ढ़ालती
भी आई है। आज़ादी पाने के बाद
भारत में बहुआयामी सामाजिक और
आर्थिक प्रगति की है। भारत कृषि में
आत्मनिर्भर बन चुका है और अब
दुनिया के सबसे औद्योगीकृत देशों की
श्रेणी में भी इसकी गिनती की जाती
है। साथ ही उन चंद देशों में भी इसका
शुमार होने लगा है, जिनके कदम चांद
तक पहुंच चुके हैं। भारत का क्षेत्रफल
32,87,263 वर्ग कि.मी. है, जो
हिमाच्छादित हिमालय की ऊंचाइयों से
शुरू होकर दक्षिण के विषुवतीय वर्षा
वनों तक फैला हुआ है। विश्व का
सातवां बड़ा देश होने के नाते भारत
शेष एशिया से अलग दिखता है
जिसकी विशेषता पर्वत और समुद्र ने
तय की है और ये इसे विशिष्ट
भौगोलिक पहचान देते हैं। उत्तर में
बृहत् पर्वत श्रृंखला हिमालय से घिरा
यह कर्क रेखा से आगे संकरा होता
जाता है। पूर्व में बंगाल की खाड़ी,
पश्चिम में अरब सागर तथा दक्षिण में
हिन्द महासागर इसकी सीमा निर्धारित
करते हैं।(1).
अनुसूचित जातियां
| क्रमांक | ग्रामीण क्षेत्र | नगरीय क्षेत्र |
|---|---|---|
| 1 | ग्रामीण जनसंख्या छोटे बड़े गांव में निवास करती है | नगरीय क्षेत्र में नगरों व काशन में निवास करती है। |
| 2 | ग्रामीण जनसंख्या का अधिकांश भाग कृषि एवं प्राथमिक व्यवसाय जैसे पशुपालन मत्स्य व्यवसाययों में लगा होता है | नगरीय जनसंख्या का अधिकांश भाग गोद एवं तृतीय व्यवसाययों जैसी नौकरी चिकित्सा व्यापार कार्यों में लगा होता है। |
| 3 | ग्रामीण जनसंख्या कि गांव की आवास्य संरचना का कोई क्रम नहीं होता है | नगरीय क्षेत्र की आवासीय संरचना व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध होती है। |
| 4 | ग्रामीण जनसंख्या में एक सामाजिक संबंध पाया जाता है। | नगरीय क्षेत्र में सामाजिक संबंध केवल औपचारिक होते हैं। |
| 5 | गांव में आवास तथा परिवहन की समस्याएं नहीं होती है। | नगरों में मकान की समस्या परिवहन स्वास्थ्य जैसी अनेक समस्याएं निर्मित होती हैं |




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| भारत- स्त्री -पुरुष का अनुपात |
प्राचीन काल से भारत में वर्ण व्यवस्था या जाति प्रथा विद्यमान है । इस प्रथा के अनुसार समाज को चार वर्णों यह जातियों में उनके व्यवसाय के अनुसार बांटा गया था -ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शुद्र । प्रारंभ में या जाति प्रथम जन्म से लागू न होकर कर्म से निर्धारित होती थी और बहुत लचीली प्रथा थी।
उनमें परस्पर रक्त संबंध, खान-पान, तथा व्यवहार होता था। किंतु जैसे-जैसे समय व्यतीत होता गया व्यक्ति का व्यवसाय भी प्राय: पैतृक होता गया तथा आगे चलकर जाति का निर्धारण भी जन्म से होने लगा। हजारों वर्षों के अंतराल में यह जाति प्रथा इतनी कठोर हो गई
कि सब में परस्पर रक्त संबंध तो दूर, आपसी खान पान हुआ व्यवहार भी प्रतिबंधित हो गया। इस जाति प्रथा से समाज की सेवा करने वाला वर्ग शुद्र बना और अछूत हो गया । संपूर्ण वर्ग या जाति में क्रमानुसार जन्म से ही विभाजित हो गई धीरे-धीरे ये विभिन्न जातियां कहलाने लगी ।
आर्थिक एवं सामाजिक दृष्टि से ये जातियां पिछढ़ती चली गई। इस जाति प्रथा ने भारत की प्रगति को अवरूद्ध कर दिया। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात इन समस्त जातियां के लोगों कों उच्च जातियों के समकक्ष लाने हेतु पहचाना गया
और इन्हें विशेष सुविधाएं देने की व्यवस्था की गयी। इस प्रकार सामाजिक, आर्थिक दृष्टि से पिछड़ी जातियां आज अनुसूचित जातियों के वर्ग में हैं।
अनुसूचित जाति के संकेंद्रण की प्रवृत्ति :- १. यह लोग कृषि व इससे संबंधित कार्य में संकलन है अतः इनका संकेंद्रण जालोद मैदाने में सर्वाधिक है जैसे- उतर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा,बिहार व पश्चिम बंगाल में।
२. नगरों की अपेक्षा उनकी जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक है ।
अनुसूचित जातियों का प्रादेशिक वितरण :- राज्य स्तर पर अनुसूचित जातियों का सर्वाधिक संकेंद्रण उत्तर प्रदेश तथा बिहार में है,
किंतु जिला स्तर पर सर्वाधिक संकेंद्रण बिहार के कुच तथा पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिलों में हुआ है। इन दोनों जिलों में कुल जनसंख्या का 75% भाग अनुसूचित जाति का है।
उत्तर प्रदेश की मिर्जापुर तथा राजस्थान के गंगानगर जिले क्रमशः तृतीय व चतुर्थ स्थान रखते हैं जहां क्रमशः ३२.६% व २९.०% जनसंख्या अनुसूचित जाति की है।
अनुसूचित जाति का मध्यम स्तर का संकेंद्रण पंजाब, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, उड़ीसा, तथा पश्चिम बंगाल में पाया जाता है। इस जनसंख्या का निम्नतम संकेंद्रण हिमाचल प्रदेश जम्मू एवं कश्मीर असम आंध्र प्रदेश कर्नाटक केरल आदि में आदि राज्यों में हुआ है मणिपुर, मेघालय, लजन्धंदल।
शहतनागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, और केंद्र शासित प्रदेश लक्षद्वीप में अनुसूचित जाति की जनसंख्या बहुत ही नगर है यहां अनुसूचित जनजातियों का बाहुल्य है सन 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में अनुसूचित जातियों की जनसंख्या लगभग 16.66 करोड़ की लगभग थी।
जो देश की कुल जनसंख्या की 16.20 प्रतिशत थी। संवैधानिक संरक्षण सामाजिक परिवर्तनों तथा आर्थिक प्रगति के कारण अनुसूचित जातियों के लोग प्रगति के पद पर अग्रसर हो चुके हैं।
भारत में अनुसूचित जनजाति जनसंख्या
भारत में अनुसूचित जनजाति उन प्रजातियों को कहा जाता है जिनके पूर्वजों को प्राचीन काल में पाश्चात्य अप्रवासी प्रजातियां ने वन प्रांत्रों एवं पहाड़ी स्थानों में खदेड़ दिया था। इसलिए उपजाऊ भूमि पर बस गए थे इन क्षेत्रों में उन्नत कृषि संभव नहीं थी अतः यह लोग अपने पर्यावरण के पूर्णता दास बन गए
इन जनजातियों की निम्नलिखित विशेषताएं हैं-
१. यह जनजातीय एक भौगोलिक प्रदेश में सभ्य जगत से दूर एकाकी जीवन व्यतीत करती हैं।
२. यह लोग पुराने ढंग की आर्थिक क्रियाओ से जीवन यापन करते हैं जैसे एकत्रित करना, मछलियां पकड़ना, शिकार करना, झुमिंग कृषि करना आदि।
३. अधिकांश अतः मांसाहारी होते हैं।
४. अधिक आंतरिक भागों में निवास करने वाली जातियां प्राय: नग्न व अर्द्ध नग्न अवस्था में रहते हैं ।
५. सांस्कृतिक दृष्टि से यह एक जनजातीय भाषा बोलते हैं ।
जनजातीय का प्रादेशिक वितरण :- भारत में जनजातियों का संकेंद्रण दो प्राकृतिक कारकों के आधार पर हुआ है - १. पहाड़ी भुमि,२. वन्य क्षेत्र। दुर्गा मा तथा पहाड़ी प्रदेशों में सामान्य पहुंच बहुत कम थी इसलिए यह जनजातीय अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रख सकी है ।
१. उत्तरी व उत्तरी पूर्वी प्रदेश :- इसे सघन जनजाति प्रदेश कहा जाता है । जनजातियों का संकेंद्रण इस प्रदेश में सबसे अधिक हुआ है। इसके अंतर्गत असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम, त्रिपुरा,व मणिपुर,राज्य सम्मिलित हैं।
इन राज्यों की कुल जनसंख्या में जनजातियों को प्रतिशत 80 से अधिक है इस ऊंचे प्रतिशत का कारण कृषि योग्य भूमि का अभाव पहाड़ी वह वनांचित भूमि की अधिकता एवं जनजातियों की मान्यताएं हैं।
उत्तरी व उतर
पूर्वी की जनजातियां
अब बात करतें हैं भारत मे रहनें वालें हम लोगों के बारे मे जहां लोग ग्रामीण क्षेत्र और शहरी क्षेत्र में रहते हैं आखिर ग्रामीण और नगर क्षेत्रों में अंतर क्या है जानेंगे हम इस लेख में
ग्रामीण क्षेत्र और शहरी क्षेत्र में अंतर
जनसंख्या का अध्ययन आयु-संरचना के जाने बिना अधूरा रहता है, क्योंकि आयु-संरचना हमारी जनसंख्या का महत्वपूर्ण लक्षण है, जो हमारे आर्थिक विकास से जुड़ा होता है। इस संपूर्ण जनसंख्या को आयु के अनुरूप दो भागों में विभाजित किया जाता है --
१.अनार्जक जनसंख्या २.अर्जक जनसंख्या।
(१)अनार्जक जनसंख्या - इस वर्ग में दो आयु संवर्ग की जनसंख्या आती है -
(क) 0-14 वर्ष वाली जनसंख्या - यह जनसंख्या पुर्णत: अर्जक जनसंख्या पर निर्भर करती है 2001 में इस वर्ग की जनसंख्या भारत की कुल जनसंख्या का 33.67% था। यह बोल स्वर्ग वाली जनसंख्या भारत में अन्य विकसित देशों की तुलना में बहुत अधिक है।
बाल स्वर्ग जनसंख्या का उच्च अनुपात पिछड़ेपन का कारण तथा सूचक है । तेजी से बढ़ती बाल जनसंख्या के लिए भरण पोषण, स्वास्थ्य व शिक्षा जैसी आवश्यक सुविधाएं भी जुटा पाना कठिन हो जाता है।
(ख) 60 वर्ष या इससे अधिक आयु वाली जनसंख्या - यह जनसंख्या भी अनर्जक जनसंख्या मानी जाती है। भारत में इस आयु संवर्ग की जनसंख्या अपेक्षाकृत कम 2001 में है । यह जनसंख्या भी अर्जक जनसंख्या पर निर्भर होती है 2001 के अनुसार यह 7% है।
(२) अर्जक जनसंख्या-इस वर्ग में 15 से 59 वर्ष के मध्य की सभी जनसंख्या आती है इस संवर्ग को अग्रलिखित उपसर्गों में विभाजित किया गया हैं ।
मानव समाज या देश में स्त्री पुरुषों की प्रति हजार संख्याओं को लिंग अनुपात कहते हैं। किसी भी संतुलित समाज या देश में यह लिंग अनुपात समान होता है।
लिंग अनुपात का निर्धारण अनेक सामाजिक आर्थिक तथा जैविक कारकों द्वारा होता है । हमारे देश में जनसंख्या के आंकड़ों से स्पष्ट होता है । की प्रति हजार पुरुषों में स्त्रियों की संख्या निरंतर घटती जा रही है।
सन् 1971 -1981 के दशक में स्त्रियों की संख्या में कुछ वृद्धि हुई है, किंतु 1991 में पुन: कमी आई है।
सन 2001 में पुणे स्त्रियों की संख्या में वृद्धि हुई है किंतु यह वृद्धि 1981 की तुलना में कम ही रही । संपूर्ण विश्व में लिंग का अनुपात 986 है विकसित देशों में लिंगानुपात ऊंचा है, जो की निम्न तालिका से स्पष्ट है
विश्व के प्रमुख 10 देशों का लिंगानुपात
स्त्रियों की जनसंख्या में कमी के कारण:-
1. भारतीय समाज में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति पुरुषों की अपेक्षा कम है।
2. लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की पालन पोषण पर कम ध्यान दिया जाता है।
3. प्रसव काल में स्त्रियों की मृत्यु होना।
4. स्त्रियों की प्राय: अपेक्षा की जाती है उनका घर चारदिवारी के भीतर ही रहना अच्छा माना जाता है।
5. स्त्रियों की शिक्षा तथा उनके स्वास्थ्य पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता है ।
भारत में केवल केरल राज्य में स्त्रियों की संख्या 1.48 करोड़ पुरुषों 1.42 करोड़ की तुलना में अधिक है यहां लिंगानुपात 1058 है, यहां के अधिकांश भागों में मातृ प्रधान सामाजिक व्यवस्था पाई जाती है
इसी प्रकार केंद्र शासित राज्य पांडिचेरी में भी स्त्रियों की संख्या अधिक है यहां लिंगानुपात 1001 एक है इसका मुख्य कारण शिक्षा का प्रचार है 9 सृजित राज्य छत्तीसगढ़ 909 झारखंड 941 एवं उत्तरांचल में लिंगानुपात 964 है
भारत की केवल 15 राज्य एवं दो केंद्र शासित प्रदेश पांडिचेरी एवं लक्ष्यदीप में लिंगानुपात राष्ट्रीय औसत से अधिक है।
किसी देश की सबसे बड़ी संपदा मानव होता है मानव द्वारा ही आर्थिक विकास संभव होता है किसी देश के आर्थिक स्तर का अनुपात वहां की रहने वाले लोगों की श्रम शक्ति से ही लगाया जा सकता है ।
मानव उत्पादक तथा उपभोक्ता दोनों ही हैं । तथा उसकी शक्ति का तात्पर्य है उसकी आर्थिक स्थिति उत्पादन क्षमता तथा विज्ञान एवं तकनीकी स्तर से है । माननीय संसाधन का विकास विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षा द्वारा किया जाता है
जिसे मानवीय शक्ति अधिक शिक्षित योग्य निपुण एवं आधुनिकतम प्राकृतिक संसाधनों के समुचित विकास के उपाय से परिचित हो जाए इससे देश का आर्थिक सामाजिक तथा राजनीतिक स्तर ऊंचा उठता है ।
जनशक्ति मैनपॉवर:- सभी प्रकार का वह मान्य श्रम जनशक्ति कहलाता है, जिसका कोई आर्थिक एवं लाभदायक उपयोग हो। इस दृष्टि से भारत की जनसंख्या को दो वर्गों में रखा जाता है।
१. कार्यरत जनसंख्या (working population)
2. अकार्यरत जनसंख्या(non working population)
१.कार्यरत जनसंख्या - शारीरिक अथवा मानसिक तौर पर किसी भी आर्थिक दृष्टि से उत्पादक कार्य में लगे लोगों को श्रमिक कहा जाता है । यह लोग किसी आर्थिक किया लाभदायक काम करके अपनी जीविका अर्जित करते हैं
और देश की आर्थिक विकास में सहयोग देते हैं। इस वर्ग में 15 से 59 वर्ष तक की आयु के सभी कार्यरत लोग सम्मिलित हैं ।
२. अकार्यरत जनसंख्या - वह व्यक्ति हैं, जो आर्थिक दृष्टि से किसी उत्पादक कार्य में नहीं लगे हैं। इस श्रेणी में गृहणियों,
विद्यार्थी एवं पेंशन पाने वाले लोग, आश्रम में रहने वाले, चोर उचक्के, भिखारी एवं 0 से 14 वर्ष की आयु स्वर्ग के बालक और 60 से अधिक आयु संवर्ग के लोग सम्मिलित हैं ।
कम आयु के बच्चों वह गृहिणी
का कार्य आय या रुपए में नहीं आंका जाता है ।
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Thanks for reading: भारत का भुगोल समस्त जानकारी हिंदी में लेखन , Sorry, my English is bad:)