आज हम जानेंगे महत्वपूर्ण किट पतंग या कीड़ों के बारे में जो हमारे जीवन में आवश्यकता भी पड़ती है और नुकसान भी करती है इन कीड़ों का जन्म कैसे हुआ उनका रहन-सहन उनके वंश उनके बारे में सब कुछ जानेंगे इस आर्टिकल के माध्यम से तो चलिए शुरू करते हैं
तो आपने अपने जीवन में कहीं भी घर में या घर की बहार कीट पतंग को देखा ही होगा आज हम उसकी जीवन चक्र के बारे में इस आर्टिकल पर बताएंगे।
कीटों के शरीर में बाढ़ स्थिति में पशुओं का विकास होने से ही एक पृथक खंड या अनुवर्ग बहिर्विकाशी इसमें सीधे पंख रखने वाले कीटों का एक मंडल एवं कूट माना जाता है उसे पक्ष कहा जाता है।
उसे ऋजुपक्ष की गण (आर्थोप्टेरा) कहते हैं । इनमें संदंशपुच्छ तैलचटा या तैलचोर काकरोच, टिड्डे ग्रासहाफर,तथा झिल्लिक आदि जातियां के किट पाये जाते हैं।
इसके अतिरिक्त शेष किटों में पिछलें पैर साधारण रुप में चलने या दौड़ने के स्थान पर उछल सकने के लिए विशेष रुप से विकसित होते हैं।
ऋजुपक्षी कीटों में तैलचटा से मिलते जुलते रुप के प्रस्ताव शेष कार्बोनिकफेरस काल की शिलाओ पर प्राप्त हो सके हैं।
इस समय तो ऋजुपक्षी कीटों का प्रसार बहुसंख्यक तथा बहुव्यापक है।
इस गण का जो वैज्ञानिक नाम है,वह प्राचीन युनानी भाषा का है। (ओर्थो-सीधा या ऋजु+प्टेरो-पक्ष या पंख) उसका अर्थ सीधा सीधी पंखों का कीट हैं।
किन्तु यह एक विभाजन हैं इस गण मे ऐसे भी किट पाये जाते हैं।
जिनमें कभी पंख उत्पन्न ही नहीं होते ।इस गण मे कुछ जातियां के किट तो कीट-जगत भर में होते हैं।
शरीर का रंग हरा होता है। पंखो के दुसरे जोड़े का रंग प्राय: बहुरंगी होता हैं। इस कारण प्राथी किट को अपने निवास क्षेत्र के पत्तों और फुलों पर रंग के ही अनुरूप रंग का होने से अपना रुप छिपा सकने से समर्थ पाया जाता है।
किसी प्राथी कीट की जाति के वक्ष से पते के समान एक अर्बुद या परिवर्धित अंग पाया जाता हैं।
प्राथी कीट के अंडों के ढेरी एक प्रकार का गाज से आच्छादित होती है। जो हवा लगने से सुख जाता है।
और पौधों की टहनी या तने से चिपक जाता हैं।अंडों से शिशु उत्पन्न होने पर अपने उदर से रेशमी सूत्र उत्पन्न करते हैं।
और उसके द्वारा लटक जाते है। तीसरी बार त्वचामोचन कर लेने तक वे इस तरह लटकें ही रहते हैं। इसके बाद रेशमी सूत्र उत्पन्न करने की उनमें कदाचित शक्ति लुप्त हो जाती है।
दंड या सींकिया कीट को अपना रुप वातावरण के अनुरुप कर छिपाने में अधिक समर्थ पाया जाता है। प्रार्थी कीट को अपने शिकार को धोखा देने के लिए रुप प्रच्छन्नता की आवश्यक होता है।
परन्तु बेचारा दंडकीट तो शाकाहारी ही होता है अतएव इसे शिकार को वध करने के स्थान पर अपना शत्रुओं द्वारा रक्षित रखने के लिए ही छिपा रखने की आवश्यकता होती है।
दंड किट में केवल बॉक्स का अगला पंख ही लंबवत नहीं
बना होता, बल्कि पिछली दोनों पंख भी वैसे ही लंबवतरे और दुबली बने होते हैं।
इस कारण सारा शरीर बड़े पतली रूप का बना पाया जाता है। उसका रंग हरा होता है अत्यंत हरी टहनियों की प्रतिमुर्ति ही इसे बना पाया जाता है दिन को प्राय: इसी रुप में वह व्यतीत करता है।
अपने पिछले जोड़े पैर से कोई कहानी पकड़कर अपना सारा शरीर टहनी से कोड सा बनाता खड़ा रहता है।
उसे एक टहनी सी समझनें का सहज धोखा होना बिल्कुल स्वाभाविक होता है। इस तरह खड़े शरीर से उसके अन्य पैर छोटी टहनियों की भांति फैलें रहते हैं।
टिड्डे और टिडडियो का जीवन चक्र
टिड्डे और टिडडियो को भी ऋजुपक्ष कीटों में गिना जाता है। टिड्डे का दो रुप पाया जाता है जिसमें एक क्षुद्रश्रृंग कहलाता है।
क्षुद्रश्रृंग टिड्डे या टिड्डी (शलभ) का शरीर लम्बाई रुप में दबा होता है। स्पर्श छोटे होते हैं।तीसरे पैर जोडे बहुत ही अधिक विकसित होते हैं।
जिसमें शक्तिशाली पेशियों का अवास्थित रखा जा सके। जिनके कारण ये बलपूर्वक लंबी उछाल मार सके।पिछले पैर के कूल्हे के भीतरी तल पर कुछ मस्सों की पंक्तियां होती हैं।
जो शब्दोत्पादक उपकरण होते हैं।वे उन्हें आगे के पैर पर बल पर संघर्ष करते हैं जिससे इनसे गायन का शब्द उत्पन्न होता है।
मादा में छोटी तथा पुष्ट अंडेदानी होती है। वह धरातल से कुछ नीचे अंडे देती है। अंडों से उत्पन्न शिशु माता-पिता के अनुरूप ही किन्तु छोटे आकार के होते हैं केवल उन्हें पंखहीन पाया जाता है।
उन्हें विपंख टिड्डी कह सकतें हैं। उनमें कुछ समय में पंख विकसित होना प्रारम्भ होते हैं तथा प्रौढ़ होने पर पूर्ण विकसित हो जाते हैं। टिडि्डयो तथा क्षुद्रश्रृंग टिंडों की ही निकटवर्ती जाति के लंबश्रृंगी टिड्डे भी होते हैं।
इन्हें वृक्ष शलभ भी भी कहते हैं। इनमें स्पर्श सुत्र लंबें होते हैं जिसे श्रृंग भी कहा जा सकता है। ये स्पर्श सुत्र मुड़कर शरीर के ऊपर लटकें होते हैं। जिससे वे उदर के सिरे तक जा पहुंचते हैं।
अंडादानी लंबी,पतली तथा वक्रित होती है बाय आगे पंख निम्र्तल पर दांत में रूप में शब्दों उत्पादक अंग होता है। जो दाये अगले पंख के ऊपरी तल पर स्थित उभाड़ से रगडकर शब्द करता है। रूपप्रच्छन्नता का उदाहरण लंबश्रृंग टिड्डे में पाया जाता है।
दक्षिण अमेरिका की एक जाति में। अगले जोड़े पंख बिल्कुल पते के समान बने होते हैं। उनमें पतियों पर किसी झिली या ढोले द्वारा बनाए गए चिन्हों के समान भी चिन्ह बने दिखाई पड़ सकते हैं।
दक्षिणी अफ्रीका की एक जाति के ढोले या झिल्ली का रुप चीटी के इतना समान होता है। कि किसी किटविज्ञान लेता को भी पहचानने में भारी कठिनाई हो सकती है।
झल्लरीपक्ष गण (थाइसेनोप्टेरा) - पर्णजीवक (लिप्स )
मत्कूण गण (हेमिप्टेरा)
- मत्कुण (बग)
अंतर्विवाही उपवर्ग (एंडोप्टेरिगोटा)
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Thanks for reading: Kido ka jivan chakra All jaankari Hindi me, Sorry, my English is bad:)