बस्तर में आदिवासी विद्रोह 1910
बस्तर के जननायक वीर गुंडाधुर धुरवा
जनजाति आदिवासी थे, लोग उसे बागा
धुरवा के नाम से जानते थे ।गुंडाधुर एक
उपाधी था जो आज भी आदिवासी
संस्कृति के जीवन धारा में प्रवाहित है ।
जिन्होंने ना तो कभी पाठशाला का मुंह
देखा ना ही बाहरी दुनिया में कदम रखा।
धुर्वा जनजाति की बहुलता उसकी पंरपरा
संस्कृति और लोकप्रियता बस्तर की
पहचान है । बस्तर में आदिवासियों की
विभिन्न प्रजातियां निवास करती हैं जो कि
अपनी अपनी अलग अलग पहचान
परपंराओं, पहनाओं,बोली और जीवन
शैली के लिए जानी जाती हैं। इन्ही
जनजातियों में धुरवा जनजाति से बस्तर
नेतानार गांव का युवा वीर गुंडाधुर धुर्वा का
निवास स्थान रहा है जो कि अपनी वीरता
कुशल नेतृत्व क्षमता व ओजस्वी वाक
पटुता में उत्साही युवक था।
गुंडा शब्द सुनते ही मन,मस्तिष्क में एक
बहुत ख़तरनाक अपराधी का तस्वीर
उभरकर सामने आती हैं लेकिन क्या
वास्तव में यह शब्द उनके के लिए प्रयुक्त
होता है वह सही एवं सटीक हैं । गुंडा शब्द
का अर्थ देखे तो पता चलता है, गुंडा
मूलतः द्रविड़ भाषा का शब्द है पुरानी
परंपरा में इसमें गुंडों व नायकों की भाव
उत्पन्न होता है।तमिल,तेलुगू,मराठी,भाषा
में गुंडा एक ताकतवर नायक का अर्थ
होता है जैसे गुंडाराव,गुंडाराज,गुंडुरावआदि। तब प्रश्न
होता है कि गुंडा शब्द अपराधी बदमाश के
अर्थ में कब क्यों और कैसे प्रतीत हो गया।
हम गुंडा शब्द का समानार्थी अर्थ ढुढने
मध्यकालीन किसी कवि,लेखक, महापुरुष
ने इस शब्द का
प्रयोग नही किया है कबीर,रविदास आदि।
आधुनिक काल में भी लेखक,कवि,
चिंतकों ने गुंडा शब्द का प्रयोग नही किया
है। 1920 में अंग्रेजी अखबारों में, 1925
अंग्रेजी साहित्य में गुंडा शब्द का प्रयोग
मिलता है। हिन्दी मे गुंडा शब्द अंग्रेजों के
फाइल से आया । यह अंग्रेजों के दिमाग
का उपज था । जब बीसवीं शताब्दी के
प्रथम दशक में बस्तर की आदिवासी
स्वतंत्रता सेनानी वीर गुंडाधुर धुरवा को
अंग्रेजों ने गुंडा (बदमाश) मान लिया। जो
उनकी सता के खिलाफ बेखौफ चुनौती दे
रहा था। जो उनका गुलाम नही हो सका
और विद्रोह करके उनकी दांत खट्टे कर
दिया था , जिसे वे कभी पकड़ नही पाये।
इसी वजह से अंग्रेजों ने गुंडा शब्द का
प्रयोग किया । ऐसे लोगों पर कार्रवाई के
लिए 'गुंडा' एक्ट बनाया ।
बस्तर का भूचाल ' भूमकाल विद्रोह' इसे
ही इतिहास में 'महा भूमकाल` के नाम से
जाना जाता है। भूतकाल का अर्थ होता है
अपनी भूमि के हक की खातिर लड़ना।
गुंडा धुर को भूमकाल का नायक माना
जाता है। जिन्होंने उद्घोष किया ''मावा नाटे
मावा राज`` बस्तर आदिवासियों का हैं
और इसे हम लेकर रहेंगे।
''मिरी डारा`` मिट्टी,लाल मिर्च,तीर कमान ,आम की डाली ।
बस्तर से ब्रिटिश हुकूमत की नीवें हिलाने के लिए गांव गांव तक लाल मिर्च, मिट्टी,
धनुष बाण और आम की टहनियां लोगों
के घर-घर तक पहुंचाने का कार्य इस
मकसद से शुरु किया कि लोग बस्तर की
अस्मिता को बचाने के लिए अंग्रेजों के
खिलाफ आगे आयें। डाॅ. रामकुमार बेहार
तथा निर्मला बेहार ने अपनी पुस्तक -
बस्तर ए अध्ययन में॑ ' तिथिवार कुछ
महत्वपूर्ण जानकारियां को संग्रहण किया
जिन्हें उद्धरित - '25 जनवरी 1910 को
ताडोकी में यह तय हुआ कि विद्रोह करना
हैं और 2 फरवरी 1910 को पुसपाल
बाजार की लुट से विद्रोह आरंभ हो गया,
7 फ़रवरी 1910 को बस्तर के तत्कालीनराजा रुद्रप्रताप देव ने सेंट्रल
प्रोविंस के चीफ कमिश्नर को तार भेजकर
विद्रोह होने और तत्काल सहायता भेजने को कहा (
स्टैडन की रिपोर्ट,29 मार्च 1910 ) ।
विद्रोह दबाने को सेंट्रल प्रोविंस के 200
सिपाही, मद्रास प्रेसीडेंसी के 150
सिपाही,पंजाब बटालियन के 170
सिपाही भेजें गए (फाॅरेन डिपार्टमेंट
फाईल,1911) । 16 फरवरी से 3 मई
1910 तक ये टुकड़ियां विद्रोह के दमन में लगीं रही।
वर्ष 1891 में जब अंग्रेजों ने बस्तर के
तत्कालीन राजा रुद्र प्रताप देव के चाचा
कालेंद्र सिंह को दीवान पद से हटा दिया ।
रुद्र प्रताप देव अंग्रेजों के प्रति समर्पित
राजा थे, लेकिन दीवान के रूप में प्रशासन
का जिम्मा उनके चाचा कालेंद्र सिंह के
पास था वह इसे बहुत बेहतर ढंग निभाते
भी थे। आदिवासी समाज में
उनकी अच्छी लोकप्रियता थी। ऐसे में
कालेंद्र सिंह को दीवान पद से हटाकर पंडा
बैजनाथ को बस्तर का प्रशासन सौंपा
जाना आदिवासियों को पसंद नहीं आया ।
अति तब हो गई जब बैजनाथ के काल में
अंग्रेजों द्वारा आदिवासियों को उनके ही
जंगलों से दुर किया जाने लगा तथा उनके
मतांतरण का प्रयास किया जाने लगा।
ऐसी स्थिति में, कालेंद्र सिंह ने विद्रोह के
सूत्रधार की भूमिका निभाते हुए
आदिवासियों को संगठित किया अंग्रेजो के
विरुद्ध सशस्त्र भूमिका विद्रोह की तैयारी शुरू हो गई ।
धूम कल का सूत्रधार लाल कालेंद्र सिंह जो की राज दरबार की दीवान भी रहे थे 25
जनवरी सन 1910 को एक गुप्त सभा में तय किया कि विद्रोह करना है। मोरिया राज की संकल्पना तथा सट्टा व्यवस्था के लिए जनसभा में दृष्टिगत रखते हुए
नेतानार गांव की युवा जमीदार गुंडाधुर धुरवा को सर्वसम्मति से भूमिकाल का सर्वदल के सर्वमान्य मानता नेता घोषित किया । लाल कालेंद्र सिंह ने प्रमुख नायक चुनने की बात सभी परगना की प्रमुख
नृत्यकर्ता की घोषणा की गई और उन्हें मंच पर बुलाकर उनका भव्य स्वागत सामान किया । जिसमें डेबरीधुर (निवासी एलंगनार ), सोनू मांझी, मुंडी कलार, धानु
धाकड़ आदि थे। जो कि अलग-अलग जनजाति से थे । सभी बहुत ही विश्वनीय थे इनके बाद भूमकाल की योजना पर कार्य आरंभ हो गया।
गुंडाधुर को इंद्रावती नदी के तट पर भूमिकाल की कमान सौपी गई। गुंडाधुर ने अपने भीतर छिपी अद्भुत संगठन क्षमता का परिचय दिया। संपूर्ण रियासत की
यात्रा की। वह एक गोटूल से दूसरे गूगल में जाकर भूमकर का संदेश प्रसारित करता रहा । डेबरीधुर उत्साही युवकों का संगठन तैयार करने में लग गया था। योजना पर खामोशी से अमल हो रहा था गुंडाधुर और लाल कालेद्र सिंह बेहतरीन नृत्य कार्य कर
रहा था। आदिवासी और गैर आदिवासी जैसे शब्द मायनेहीन हो गए और बाहरी शब्द की परिभाषा ने स्पष्टता रुप धारण किया। बाहरी अर्थात अंग्रेज, अंग्रेज अधिकारी, दीवान पंडा बैजनाथ, पुलिस, डाक कर्मचारी, मिशनरी । गुंडाधुर जहां
जाता उनका स्वागत देवदूत के आगमन सहस्य होता था, जहां वह बिना थके अधिक से अधिक समूह को जोडता गया । अधिक से अधिक गोटुलों में पहुंच कर भूमकाल की मूल भावना को बताते गया ।
किसी ने उसके तेजस्वी मुख पर लेसमात्र भी थकान नहीं देखी । सच्चे नायक जानते हैं कि योजना को कैसे मुक्त किया जाता है, गुंडाधुर का कुशल प्रबंधन देखने योग्य था । जन जन तक उनकी इस अश्विनी
तरीके से पहुंचने के तरीके से वितरण की प्रसारित होने लगा था कि गुंडा दुर में उड़ने की शक्ति प्राप्त है वह जादुई शक्तियों का स्वामी है जब भूमि कल शुरू होगा और
अंग्रेज बंदूक चलाएंगे तो गुंडा दूर अपने मंत्र से गोली को पानी बना देगा अनेक तरह की कहानी गुंडाधुर की विषय में कहीं सोने जाने लगी राज्य के दक्षिण पूर्वी हिस्से
में विद्रोही कैसे दलों में विभाजित और थे और एक साथ कई मोचन पर युद्ध कर रहे थे गुंडा दूर तक हर परिस्थिति की सूचना निरंतर पहुंचाई जा रही थी जब जहां
विद्रोही कमजोर होता तो वह स्वयं वहन उसका बढ़ाने के लिए उपस्थित हो जाता था यह युद्ध केवल अंग्रेज अधिकारियों में
पुलिस या राजा के सैनिकों के बीच ही नहीं था यह दो प्रतिबंधहथाओं के बीच का युद्ध हो गया था एक और राजा और
उसके समर्थक आदिवासी और दूसरी ओर मुरियाराज के लिये प्रतिबंध आदिवासी। भारत के आदिवासी आंदोलन के इतिहास
में वर्ष 1910 जैसे उदाहरण काम ही मिलते हैं जहां एक पूरी रियासत के आदिवासियों ने अपनी जातिगत बोली
विभिन्नताओं से ऊपर उठकर अपने भी भेद से आगे बढ़कर जी एकता के सूत्र में
बंद गए थे उसका नाम था वीर गुंडा धुर संपूर्ण विद्रोह को समर्पित से देखा जाए तो
नेतानार का एक साधारण व्यक्ति अद्भुत संगठन करता सिद्ध हुआ था
प्रस्तुतकर्ता - गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्या
लय बिलासपुर छत्तीसगढ़
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Thanks for reading: आदिवासी वीर योद्धा गुंडाधुर की जीवनी हिंदी में , Sorry, my English is bad:)