100+ सफलता के अनमोल विचार जो कर देंगे आपको अपने लक्ष्य के लिए तैयार करें
आज के सुविचार अनमोल वचन कोट्स
मां ने कहा - "बच्चे,अब तुम समझदार हो गये हों।
स्नान र लिया करों और प्रतिदिन तुलसी के इस वृक्ष में जल भी चढ़ाया करों।
तुलसी की उपासना की हमारी पंरपरा पुरखों से चली आ रही है।"
बच्चे ने तर्क़ किया " मां तुम कितनी भोली हो?
इतना भी नहीं जानती कि यह तो पेड़ है ? पेड़ों की भी कही पुजा होती इसमें समय व्यर्थ खोने से क्या लाभ ?
लाभ हैं मुन्ने! श्रद्धा कभी निरर्थक नही जाती। हमारी जीवन में जो विकास और बौद्धिकता है,उसका अधार श्रध्दा ही है।
श्रद्धा छोटी उपासना से विकसित होती है और अंत में जीवन को महान बना देती है, इसलिए यह भाव भी निर्मल नहीं ।
तापसी वीनोबा भाभी जी ने प्रतिदिन तुलसी को जल देना प्रारंभ कर दिया ।
मां की शिक्षा कितनी सत्य निकली उसका प्रमाण अब सबके सामने है ।
लोकमान्य तिलक कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने के लिए लखनऊ आय।
लखनऊ कांग्रेस में कार्यक्रम अत्यंत व्यस्त था, क्योंकि इसके दौरान विभिन्न दलों और कुतों में एकता स्थापित करने के लिए बात चीत हुई थी।
अधिवेशन में एक दिन लोकमान्य बहुत तड़के से व्यस्त रहे और दोपहर तक एक क्षण के लिए भी अवकाश न पा सके। बड़ी कठिनाई से उन्हें भोजन के लिए उठाए जा सका भोजन के समय पर उसने वाली
स्वयंसेवक ने कहा - महाराज ! आज तो आपको बिना पूजा किया ही भोजन करना पड़ा । लोकमान्य गंभीर हो गए।
और बोले- अभी तक जो हम कर रहे थे क्या वह पूजा नहीं थी ?
क्या घंटी शंख बजाना और चंदन गिना ही पूजा है?
समाज सेवा से बढ़कर और कौन सी पूजा हो सकती है ।
सिख संप्रदाय के चौथे गुरु श्री राम दास जी के अनेक शिष्य थे
सभी की अपनी अपनी विशेषताएं थी
उनमें सेक्सी से ऐसे थे जिनकी विशेषता श्रद्धा और आज्ञा पालन ही थी
इनका नाम था अर्जुन देव
अर्जुन देव ने दीक्षा लेकर आश्रम में प्रवेश किया ,तो उन्हें बर्तन मांजने का काम सौंपा गया ।
वह सवेरे से शाम तक बर्तन मांजने में लगे रहते । अन्य शिष्य जबकि धर्म चर्चा और गुरु पूजा में लगते,
तब भी अर्जुन देव अपने नियत कर्म के अतिरिक्त दुसरी बात न सोचते।
बर्तन मांजना ही उनके लिए सबसे बडी साधना बना हुआ था।
गुरु ने यही तों आदेश उन्हें दिया था।
गुरुजी के आश्वासन का समय आया।सभी शिष्य यह आशा लगाए हुए थे
कि बढ़ी चढी योग्यता के कारण उन्हें ही उतराधिकारी मिलेगा, वे गुरु के गद्दी पर बैठेंगे।
गुरुदेव अपना घोषणापत्र लिख चुके थे।उनकी मृत्यु के बाद ही उसे खोला जाना था ।
समय आया । गुरुदेव दिगंत हुए । घोषणा पत्र खुला । उसमें अर्जुन देव को उत्तराधिकारी माना गया था ।
सुनने वालों ने आश्चर्य किया कि इस सबसे कम योगी को यह पद कैसे मिला ?
समाधान करने वालों ने समझाया कि श्रद्धा और अनुशासन - यही शीशे की सबसे बड़ी योग्यता है
गुरुदेव की परख ठीक ही थी । और निर्णय भी ठीक ही था ।
अर्जुन देव सिख धर्म के पांचवी गुरु हुए, उन्होंने अपनी योग्यता की बल पर नहीं, श्रद्धा के वॉलपेपर सिख धर्म की भारी सेवा की और प्रगति की।
एक बार सादी के पास एक व्यक्ति गया और कहने लगा "आपका अमुघ शत्रु आपकी बुराई कर रहा था
और आपके तरह-तरह की गालियां बक रहा था"
सो तो मैं भी जानता हूँ।' थोड़ा रुककर शेख सादी बोले-"भाई शत्रु तो कहलाता वही है, जिससे बैर-विरोध हो।
पर कम से कम इतना तो है कि वह मुँह के सामने कुछ नहीं कहता। आप तो मेरे सामने ही बुराई कर रहे हैं,
अब आप ही बताइए कि मेरा शत्रु कौन है ? अच्छा होता, आपने मेरा जी न दुखाया होता और चुपचाप ही बने रहते।"
बुराई करने वाला व्यक्ति बहुत लज्जित हुआ और वहाँ से उठकर चला गया।
उस दिन से उसने कभी किसी की बुराई नहीं की।
बिहार के चंपारन जिले में महात्मा गाँधी का शिविर लगा था।
किसानों पर होने वाले सरकारी अत्याचारों की जाँच चल रही थी।
हजारों की तादाद में किसान आ-आकर बापू से अपने दुःख निवेदन कर रहे थे।
उस समय उस जाँच आंदोलन में कृपलानी जी का बड़ा प्रमुख सहयोग था।
वे गाँधी जी के कैंप सेक्रेटरी के रूप में काम कर रहे थे।
इसलिए जिला अधिकारियों की आँख की किरकिरी बने हुए थे।
इस जाँच-पड़ताल के दौरान महात्मा जी को अनेक चिट्ठियाँ दिन में बहुत बार कलेक्टर के पास भेजनी पड़ती थीं।
यह सब डाक ले जाने का काम कृपलानी जी ही करते थे।
कृपलानी जी को डाक लाते-ले जाते देखकर एक बार कलेक्टर ने पूछा
आप ही तो वह प्रो० कृपलानी हैं, जो इस सब हलचल के मुखिया हैं।
फिर आप यह डाक का काम क्यों करते हैं ?
कृपलानी जी ने उत्तर दिया, "मैं तो एक साधारण कार्यकर्ता और बापू का चपरासी हूँ।"
कृपलानी जी का उत्तर सुनकर कलेक्टर ने महात्मा गाँधी की महानता को समझा और आं
दोलन की गरिमा का अंदाज लगा लिया।
Rate This Article
Thanks for reading: आज के सुविचार अनमोल वचन कोट्स , Sorry, my English is bad:)