हैलो दोस्तो एक बार फिर से आप सबका स्वागत है इस पोस्ट पर तों आज हम सरगुजा विश्वविद्यालय के माॅडल पेपर का Answer sheet बताने जा रहे हैं जो कि 2024- 25 का प्रतिवर्ष सेकेंड और फाइनल का होने वाला ANNUAL EXAM होता है तों ये क्वेश्चन पेपर महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हैं
मेन परिक्षा परिणाम में आने के लिए इसलिए आज हम सरगुजा विश्वविद्यालय के Annual examination 2024-25 का विषय हिंदी भाषा के साथ सभी विषयों का पुरा उत्तर पुस्तिका सहित समझाएंगे तो चलिए जानते हैं इस वर्ष का क्वेश्चन किस तरह का था
| B.a / b.sc / B.com 3nd year Pre- Annual examination 2024-25 (F.C Hindi Bhasha (Answer sheet) |
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प्रश्न 1.(क) भारत माता कविता का भावार्थ अपने शब्दों में लिखिए ( 8 )
या
भारत माता के स्वरूप को कवि ने किस तरह से व्यक्त किया है।
उत्तर - भारत माता के स्वरूप को अभिव्यक्त करते हुए पन्तजी कहते हैं
"भारत माता ग्रामवासिनी। खेतों में फैला है श्यामल
धूल भरा मैला-सा आँचल।"
कवि पन्तजी कहते हैं कि 'भारत माता' गाँवों में निवास करने वाली है। क्योंकि भारत की अधिकांश जनता माँवों में ही रहती है। हरे-लहलहाते खेतों में आँख की कालिमा की तरह श्यामलता बिखरी हुई है। गंगा-यमुना का पावन जल उसके पवित्र श्रम का जल है।
वह शील-सम्पन्नता की साक्षात् प्रतिमा है, वह सुख-दुःख में समभाव से रहती है, उसे सुख से न तो प्रसन्नता होती है और न दुःख से विषाद।
( ख ) शैली किसे कहते हैं कथन शैली के प्रकारों को उदाहरण सहित समझाइए। ( 7 )
या
विवरण आत्मक शैली से आप क्या समझते है उदाहरण देते हुए उसकी विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर - वास्तव में शैली से तात्पर्य किसी भी विधि, तरीके, ढंग, प्रणाली या पद्धति आदि से है। अंग्रेजी में शैली शब्द के लिए 'स्टाइल' का प्रयोग किया जाता है। शैली द्वारा ही मनुष्य की पहचान होती है। मनुष्य अपने भावों अथवा विचारों को दूसरों तक संप्रेषित करने के लिए भाषा में अनेक प्रयोग करता है। उसकी यह इच्छा रहती है कि अपनी बात स्पष्ट एवं प्रभावी ढंग से दूसरों तक पहुँचा सके। मनुष्य द्वारा भाषा-प्रयोग में उसकी यही इच्छा कार्य करती है। भाषा के ये विविध प्रयोग परिस्थितियों और विषयवस्तु पर निर्भर करते हैं। यहाँ कथन की शैली का तात्पर्य भाषा प्रयोग के ढंग से ही है।
जब कोई वैज्ञानिक या कोई साहित्यकार अपनी अनुभूति और अनुभव का सम्प्रेषण किसी विशिष्ट भाषा में करता है तब उस शैली की उत्पत्ति होती है। सुप्रसिद्ध आलोचक डॉ. जॉनसन के अनुसार "सामान्य व्यवहार में बातचीत करने का तरीका या बोलचाल का ढंग शैली कहलाती है।" उसी तरह कथन की भी अपनी शैली होती है। प्रत्येक व्यक्ति का कहने या बोलने का अपना तरीका होता है। जिसे कथन शैली कहते हैं। बोलने और लिखने का यही विशेष ढंग शैली कहलाता है। शैली विचारों के सम्प्रेषण की कला है।
कथन की निम्नलिखित प्रमुख शैलियाँ हैं-
(1) विवरणात्मक शैली
(2) मूल्यांकन शैली
(3) व्याख्यात्मक शैली
(4) विचारात्मक शैली
(1) विवरणात्मक शैली-एक एक ऐसी शैली जिसमें वक्ता घटना अथवा किसी वस्तु का हूबहू वर्णन करता है, जिसमें वक्ता तटस्थ हो, उसकी अपनी कोई प्रतिक्रिया न हो, वह विवरणात्मक शैली कहलाता है। विवरण का अर्थ है भाषा के माध्यम से किसी घटना अथवा व्यक्ति की यथावत् प्रस्तुति। घटना या कथ्य के विषय में वक्ता का अपना कोई राग द्वेष नहीं होता। वह जैसा देखता है अथवा सुनता है वैसा विवरण प्रस्तुत कर देता है। वक्ता के द्वारा दिया हुआ विवरण दो प्रकार से होता है-
प्रत्यक्ष कथन के रूप में इसमें वक्ता का उल्लेख होता है और वक्ता भी पाठक के सामने होता है। इसमें घटना का विवरण या कथन उद्वरण चिह्न "....." में रहता है। जैसे बाल गंगाधर तिलक ने कहा था, "स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर ही रहूँगा।"
अप्रत्यक्ष कथन के रूप में इस कथन की शैली में वक्ता स्वयं प्रत्यक्ष नहीं होता है इसमें घटना प्रमुख होती है। इसमें उद्धरण चिह्न के स्थान पर 'कि' आदि संयोजकों को जोड़कर वाक्य रचना की जाती है। जैसे आज मैं काम पर नहीं जाऊँगा। वर्षा हो रही थी, चारों ओर पानी ही पानी, कहीं सूखी जमीन नहीं, बादल और भी घने होते जा रहे थे, बिजली की कड़क और चमक भी अपना जोर दिखला रही थी।
प्रत्यक्ष कथन में वक्ता का उल्लेख होता है, स्रोता जानता है कि वक्ता कौन है किन्तु अप्रत्यक्ष क्रथन के विवरण में वक्ता स्वयं व्यक्त नहीं होता।
विवरणात्मक शैली की विशेषताएँ
(1) इसकी भाषा सरल व स्पष्ट होती है।
(2) इसमें अलंकारों वाली संरचनाएँ नहीं होर्ती।
(3) कर्मवाच्य प्रधान संरचनाओं की अधिकता होती है।
(4) इसमें समान्यतः ऐसा कोई वाक्य या वाक्यांश नहीं होता है जिसमें वक्ता की प्रतिक्रिया स्पष्ट प्रकट हो।
(5) विवरण साधारणतः भूतकाल में घटित बातों का होता है, इसलिए साधारणतः इसमें भूतकाल के क्रियारूपों का प्रयोग किया जाता है।
(6) इसमें तथ्यात्मकता होती है।
विवरणात्मक शैली के उदाहरण-
(1) विज्ञान के विषय में विवरणात्मक शैली- हम सभी कार्बन डाइऑक्साइड गैसों से परिचित हैं। श्वसन प्रक्रिया के अन्तर्गत हम ऑक्सीजन ग्रहण कर कार्बन डाइ-ऑक्साइड गैसें छोड़ते हैं। पेड़ पौधों में यह प्रक्रिया इसकी उलटी होती है। वे कार्बन डाइ-ऑक्साइड गैस छोड़ते हैं। कार्बन डाइऑक्साइइड गैस वनस्पतियों की रक्षक है। पेड़ पौधों के होने वाली प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में कार्बन डाइ-ऑक्साइड गैस अनिवार्य है।
(2) वाणिज्य के विषय में विवरणात्मक शैली - वस्तु का मूल्य निर्धारित करने के लिए माँग व पूर्ति का होना अनिवार्य है। केवल माँग अथवा केवल पूर्ति मूल्य निर्धारण हेतु पर्याप्त नहीं है। जिस प्रकार कैंची के दोनों जालकों में कोई एक फलक अकेला ही कागज को नहीं काट सकता, उसी तरह केवल उत्पादन व्यय या केवल माँग मूल्य का निर्धारण नहीं कर सकती। कागज तब ही कटता है, अब इसके दोनों फलक किसी एक स्थान पर एक दूसरे से मिलते हैं। इसी प्रकार वस्तु का मूल्य उसी स्थान पर निर्धारित होता है, जहाँ कि माँग व पूर्ति की शक्तियाँ सन्तुलन में होती है।
(3) कला के विषय में विवरणात्मक शैली उदाहरण- माटी बिहार पूजन विधि आदिवासियों की अपनी परम्परागत शैली में सम्पूर्ण की जाती है। सबसे पहले गाँव का सरपंच या मुखिया या पटेल के द्वारा 'माटी पुजारी' के घर जाकर 'माटी बिहार' मनाने के हेतु निवेदन किया जाता है। फिर माटी पुजारी सलाह करके एक तिथि तथा मुहूर्त निर्धारित करते हैं। उस तय की गई तिथि के अन्दर सूर्योदय से काफी पहले उठकर, नहा-धोकर तैयार होकर माटी पुजारी गुड़ी पहुँच जाता है। वहाँ लोक देवी-देवताओं की मूर्ति या चित्र के आगे दीपक जलाए जाते हैं। विचित्र आवाजों के साथ आम शब्दों का ऊँचे स्वर में उच्चारण किया जाता है। पुजारी उस दिन निराहार उपवास करता है। वह उनकी परम्परागत पूजा मानी गई है।
मूल्यांकन शैली वक्ता जब किसी घटना अथवा व्यक्ति के सम्बन्ध में देखने व सुनने वाले के प्रति जो प्रतिक्रिया करता है। यह प्रतिक्रिया ही भाषा प्रयोग में मूल्यांकन परक शैली को प्रेरित करती है। घटना अथवा व्यक्ति का मूल्यांकन प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी दृष्टि से करता है। प्रत्येक व्यक्ति के सोचने का ढंग उसके संस्कारों, उसकी शिक्षा आदि पर निर्भर करता है जिसके कारण एक ही घटना, वस्तु या व्यक्ति का मूल्यांकन अलग-अलग व्यक्ति अलग अलग ढंग से करते हैं तथा अपनी अलग अलग राय देते हैं। अर्थात् मूल्यांकन शैली का अर्थ निष्कर्ष निकालना या मूल्य आँकना होता है। इसे आलोचना शैली अथवा समीक्षात्मक शैली भी कहा जाता है।
मूल्यांकन शैली की विशेषताएँ
(1) मूल्यांकन शैली में किसी व्यक्ति, घटना या विषय वस्तु के सम्बन्ध में निष्कर्ष प्रस्तुत किया जाता है।
(2) इसमें वैयक्तिकता दिखाई देती है।
(3) इसमें कारण-कार्य सम्बन्ध वाक्यों की तथा विधि निषेध मूलक वाक्यों की संरचना होती है।
(4) इस शैली के अन्तर्गत वक्ता अपनी दृष्टि से मूल्यांकन करता है। जैसे मेरा मत है, हमारी द्वति, मगर आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है।
(5) इसमें प्रश्न वाक्यों का प्रयोग होता है तथा मिश्र वाक्यों का प्रयोग भी होता है।
(6) कभी-कभी मूल्यांकन को प्रभावशाली बनाने हेतु दूसरों से तुलना भी की जाती है। इसके लिए जितनी, उतनी, कैसा वैसा, जब-तब आदि तुलना सूचक शब्दों का प्रयोग किया जाता है।
(7) यह शैली शिक्षा विज्ञान और किसी समस्या के समाधान हेतु काम आदि है। (8) इसमें प्रतिक्रिया, गुण-दोष, तर्क, विभिन्न मतों का अधिक महत्व होने के कारण व्यक्ति का महत्व भी प्रकट होता है।
(9) मूल्यांकन शैली को आलोचनात्मक अथवा समीक्षात्मक शैली भी कहा जाता है।
(10) इसके कारण कार्य सम्बन्ध वाक्यों की तथा विधि निषेध मूलक वाक्यों की संरचना होती है।
(1) विज्ञान के विषय में मूल्यांकन पर शैली शहरों में कुष्ठ रोगियों का लेखा-जोखा जब तक पूरा नहीं होगा जब तक इन रोगियों की कमियाँ व पुनर्व्यवस्थापन की बात सामने नहीं आ जाएगी। झोपड़ पट्टियों में ऐसे मरीजों का सर्वेक्षण करने पर पाया गया कि रोग की प्राथमिक अवस्था में ही विभिन्न उपचार साधनों के प्रयोग के लिए इन्हें प्रोत्साहन नहीं किया गया। वहाँ ऐसे मरीजों की अधिक संख्या है, जिसमें रोग की प्राथमिक अवस्था में ही कुरूपता आ जाती है। इसलिए यह आवश्यक है कि अर्ध चिकित्सीय कर्मचारियों, समाज सेवियों आदि के दल बनाए जाएँ जो उन्हें आवश्यक जानकारी दें। कुष्ठ रोग से छुटकारा पाने के लिए दो तरह से अभियान चलाए जाए। पहला प्रभावशाली दवाओं के द्वारा उपचार कर उनकी संख्या कम की जाए। दूसरा, सर्वेक्षण दल इस रोग से बचने के बारे में उचित सलाह दें।
(2) वाणिज्य के विषय में मूल्यांकन पर शैली- जैसा कि अल्पविकसित देशों की जनसंख्या के स्वरूप, प्राकृतिक साधन, विकास के स्तर की गति और राजनीतिक तथा सामाजिक संस्थाओं में अन्तर्निहित अनेकता से नीति सम्बन्धी विशिष्ट उपायों के बारे में सम्भावित सामान्यीकरण कर सकने की गुंजाइश कम हो जाती है। प्रति व्यक्ति आय तथा पूँजी का निम्न स्तर, जो कि सभी अल्प विकसित देशों की एक सामान्य बात है, वह सामान्य विश्लेषण सम्बन्धी निष्कर्षों के लिए अक्सर एक अपर्याप्त आधार सिद्ध होता है और नीति निर्धारण के लिए सामान्य सिफारिशों के सम्बन्ध में तो और भी अपर्याप्त होता है। इसी कारण नीति सम्बन्धी एक ही उपाय के परिणाम भिन्न-भिन्न अल्पविकसित देशों में भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। जैसे सरकारी प्रशासन और उसकी सेवाओं का लाभ उठाने वाली जनता के स्वरूप में भारी परिवर्तन होता है। इसलिए नीति-सम्बन्धी विशेष उपायों की कुशलता पर इसका प्रभाव पड़ता है।
(3) कला के विषय में मूल्यांकन पर शैली-अरस्तू को पाश्चात्य काव्य शास्त्र के आद्याचार्य माना गया है। उनका ऐतिहासिक दृष्टि से उनका स्थान वही है जो भारतीय काव्य-शास्त्र में भरत का। जैसे भारत में भरत मुनि से पूर्व वृशाश्व, शिलालि आदि अनेक आचार्य इस क्षेत्र में कार्य कर चुके थे परन्तु सबसे पहला व्यवस्थित विवेचन भरत मुनि के नाट्य-शास्त्र में ही उपलब्ध है। ऐसी ही यूरोप में अरस्तू से पहले प्रोतगोरस, हिप्पिअस, अरिस्तोफनेस और प्लेटो आदि विद्वान काव्य के विभिन्न अंगों का सैद्धान्तिक विवेचन कर चुके थे परन्तु उनमें से किसी का विवेचन इतना नियमित एवं व्यवस्थित नहीं था कि उसे काव्य-शास्त्र की संज्ञा दी जाए। प्लेटो ने काव्य और कवि के विषय में बहुत कुछ कहा है, किन्तु इस विषय में उनका दृष्टिकोण निषेधात्मक था, अतः कतिपय स्थापनाओं को स्वीकार करते हुए भी उन्हें काव्य-शास्त्र के प्रथम आचार्य पद पर अधिष्ठित करना अनुचित होगा। यह सम्मान एकमात्र अरस्तू को ही प्राप्त हुआ है।
व्याख्यात्मक शैली-किसी अस्पष्ट अथवा जटिल विषय-वस्तु को समझाकर प्रस्तुत करने की विधि को व्याख्यात्मक शैली कहा जाता है। इसमें वक्ता या लेखक स्वयं व्याख्या करता है इसलिए यह तटस्थ नहीं रहती। यह शैली सूत्र रूप में की गई बात को स्पष्ट करने के लिये भी प्रयुक्त होती है। (या जब कोई व्यक्ति किसी कथ्य, सूत्र विचार की व्याख्या करता है अथवा उसे समझता है तो वहाँ व्याख्यात्मक शैली का प्रयोग होता है।)
व्याख्यात्मक शैली की विशेषताएँ-
(1) व्याख्यापरक शैली में एक सूत्र वाक्य की व्याख्या की जाती है, साथ ही इसमें परिभाषित शब्दों को भी स्पष्ट किया जाता है।
(2) इस शैली में व्याख्या के स्पष्टीकरण के लिए एक ही बात को बार-बार कहा जाता है अतः यह शैली अध्यापन क्षेत्र में विशेष प्रभावी होती है।
(3) इस शैली में उदाहरणों का भी महत्व होता है जिससे बात स्पष्ट हो सके।
(4) वाक्य एक सुनिश्चित अर्थ वाले होते हैं तथा इसमें अधूरे वाक्यों का प्रयोग नहीं होता है।
(5) इसमें सरल वाक्यों का प्रयोग होता है।
(6) अधूरे अथवा दो अर्थों वाले वाक्यों तथा अशुद्ध वाक्य का प्रयोग नहीं होता है।
(7) इस शैली में आवश्यकतानुसार किसी भी काल को व्यक्त करने वाली क्रियाओं का प्रयोग हो सकता है।
(8) व्याख्यात्मक शैली में कारण कार्य सम्बन्ध के वाक्यों का अत्यन्त महत्व होता है। इनसे व्याख्या के सूत्र एक दूसरे के साथ सम्बद्ध हो जाते हैं।
(9) इस शैली में आवश्यकतानुसार किसी भी काल को अभिव्यक्त करने वाली क्रियाओं का प्रयोग भी किया जाता है।
(10) कथन की स्पष्ट व्याख्या के लिए कथ्य के निषेधात्मक पक्ष को भी प्रकट करना होता है।
(11) व्याख्या के प्रसंग में जिस बात की व्याख्या की जाती है उससे सम्बद्ध विषयों का आख्यान भी होता है।
(12) इस कथन शैली में अतः, अतएव, यदि मान लिया जाये, वरन्, किन्तु, परन्तु आदि का भी प्रयोग होता है। साथ ही इसमें अर्थात्, कहने का अभिप्राय यह कि, तात्पर्य यह है, आदि का भी प्रयोग होता है।
प्रश्न 2. ( क ) सुखी डाली मे परिवार की किस सदस्य को उठाया गया है, परिवार का मुखिया किस तरह अपने परिवार को टुटने से बचाता है ( 8 )
या
सूखी डाली के पत्र बेला का चरित्र चित्रण कीजिए।
उत्तर - सूखी डाली के पत्र बेला के चरित्र को केंद्र में रखकर लिखी गई एक संवेदनशील कहानी है, जिसमें बेला के संघर्ष, भावनाओं और जीवन की त्रासदी को उजागर किया गया है। बेला एक ऐसी स्त्री है, जो समाज की रूढ़ियों और परिस्थितियों के कारण असहाय और दुखी हो जाती है।
बेला का चरित्र चित्रण:
1. संवेदनशील और प्रेमपूर्ण:
बेला एक अत्यंत संवेदनशील महिला है, जो अपने पति से प्रेम करती है और परिवार के प्रति समर्पित रहती है। वह चाहती है कि उसका दांपत्य जीवन सुखमय हो, लेकिन परिस्थितियाँ उसके विपरीत होती हैं।
2. त्यागमयी और सहनशील:
बेला ने अपने जीवन में अनेक कष्ट सहे, लेकिन उसने अपने परिवार और रिश्तों को निभाने का प्रयास किया। वह एक सहनशील स्त्री है, जो अपने दुखों को चुपचाप सहती रहती है।
3. दुर्भाग्यशाली:
बेला का जीवन त्रासदी से भरा हुआ है। वह चाहकर भी अपने जीवन को खुशहाल नहीं बना पाती। परिस्थितियाँ और समाज की जटिलताएँ उसे बार-बार निराशा की ओर धकेलती हैं।
4. स्वाभिमानी:
बेला अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं करती। वह अपने दर्द और संघर्षों को अकेले सहती है, लेकिन अपने आत्म-सम्मान को बनाए रखती है।
5. यथार्थवादी:
बेला एक यथार्थवादी महिला है, जो जीवन की कठोर सच्चाइयों को स्वीकार करती है। वह जानती है कि जीवन में हमेशा इच्छानुसार नहीं होता, फिर भी वह संघर्ष करती रहती है।
निष्कर्ष:
बेला का चरित्र भारतीय समाज में नारी की पीड़ा और त्याग का प्रतीक है। वह प्रेम, करुणा, त्याग और संघर्ष की मिसाल है, जो अपने जीवन की कठिनाइयों का सामना करती है, लेकिन अंततः अकेलेपन और पीड़ा की शिकार हो जाती है। "सूखी डाली के पत्र" में बेला का चरित्र समाज में नारी की स्थिति पर गहरी टिप्पणी करता है।
( ख ) निषेध पारक संरचना क्या है विभिन्न प्रकार की निषेध पारक संरचना लिखिए ।
या
कालबोधक संरचना से क्या तात्पर्य है उदाहरण सहित लिखिए
उत्तर - निषेधपरक संरचना- निषेधपरक संरचना से तात्पर्य इस प्रकार की संरचना से है जिसमें किसी कार्य को न करने का भाव ध्वनित होता है। मना करना, न करना, करने के लिए अपनी असहमति प्रकट करना ही निषेध कहलाता है। जब यह निषेध वाक्यों व उसके अर्थ द्वारा व्यक्त करते हैं तो उसे निषेधपरक संरचना कहते हैं।
हिन्दी में विभिन्न निषेधपरक शब्द या अव्यय हैं जो निषेध की अभिव्यक्ति करते हैं। जैसे-मत, न, नहीं, शून्य, विहीन हीन, रहित आदि। हिन्दी भाषा में निषेध प्रकट करने वाले वाक्यों को दो प्रकारों के अन्तर्गत रखा जा सकता है
1. वे वाक्य जिनमें शब्द के द्वारा ही किसी बात का निषेध प्रकट होता है, जैसे-
महेश अनपढ़ है।
यहाँ यह चित्र असंगत है।
2. वे वाक्य जिनमें शून्य, विहिन, हीन, रहित आदि शब्दों से समास बनाकर निषेध प्रकट किया जाता है जैसे-
उमा ज्ञान विहीन है।
यह स्थान जन शून्य है।
कुछ ऐसे अव्यय भी हैं जो वाक्य में प्रयुक्त होकर ही निषेध की सूचना देते हैं। ये शब्द साक्षात् निषेधसूचक हैं, जैसे मत, न, नहीं।
इनके अतिरिक्त कुछ और प्रयोग भी हैं जिनसे निषेध की सूचना मिलती है, जैसे
'थोड़े' शब्द के प्रयोग से
अब वह थोड़े ही काम करेगा।
'भला' शब्द के प्रयोग से
भला ऐसा भी होता है।
'चुका' शब्द के प्रयोग से-
हो चुका उससे यह काम।
जा चुका वह।
प्रश्न 3 ( क ) मालती जोशी कृत कहानी वसीयत का उद्देश्य क्या है । ( 8 )
या
वसीयत के पात्र हरीश का चरिरत्रकांन कीजिए ।
उत्तर - मालती जोशी कृत कहानी "वसीयत" का उद्देश्य समाज में स्त्री की स्थिति, परिवार में उसके योगदान और भावनात्मक रिश्तों की गहराई को उजागर करना है। यह कहानी नारी के त्याग, सहनशीलता और आत्मसम्मान को प्रमुखता से दर्शाती है।
कहानी का उद्देश्य:
1. नारी के महत्व को दर्शाना:
कहानी यह बताती है कि एक स्त्री केवल परिवार की देखभाल करने वाली नहीं होती, बल्कि वह परिवार की असली धुरी होती है। उसके बिना परिवार की कल्पना अधूरी है।
2. पारिवारिक रिश्तों की सच्चाई:
कहानी में यह दिखाया गया है कि जब तक व्यक्ति जीवित रहता है, तब तक उसकी कद्र नहीं की जाती, लेकिन उसके जाने के बाद उसकी महत्ता समझ में आती है।
3. स्वार्थ और संवेदनहीनता पर प्रहार:
यह कहानी उन परिवारों की सच्चाई को उजागर करती है, जहाँ लोग अपने स्वार्थ में इतने लिप्त होते हैं कि उन्हें अपने माता-पिता की भावनाओं और उनकी तकलीफों की परवाह नहीं होती।
4. संस्कारों और मूल्यों की शिक्षा:
कहानी यह संदेश देती है कि जीवन में धन-दौलत से अधिक परिवार के रिश्तों और मानवीय संवेदनाओं का मूल्य होता है। अगर इन्हें समय रहते नहीं समझा गया, तो पछतावे के अलावा कुछ नहीं बचता।
निष्कर्ष:
"वसीयत" कहानी पाठकों को यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि हम अपने परिवार के बुजुर्गों की कितनी कद्र करते हैं। यह कहानी एक गहरी सीख देती है कि हमें अपने माता-पिता और परिजनों का सम्मान और प्रेम करते हुए उनके योगदान को स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि उनके बिना परिवार अधूरा होता है।
( ख ) परिपत्र किसे कहते हैं परिपत्र बनाते समय किन किन बातों का ध्यान रखना चाहिए प्रारुप देते हुए समझाइए ।
या
आदेश का प्रयोग किन किन रुपों में किया जाता है आदेश का एक उदाहरण देकर प्रयोग विधि समझाइए
उत्तर - आदेश कार्यालयों में आदेश एक बहुप्रचलित और महत्वपूर्ण कार्यालयीन पत्र है। जब किसी मन्त्रालय या विभाग में एक या अधिक कर्मचारियों की उनमे सम्बन्धित सूचनाएँ भेजनी हों, तब कार्यालय आदेश का प्रयोग किया जाता है। आदेश सीमा विस्तृत होती है तथा वह एक कार्यालय तक सीमित न रहकर सबकी लिए लागू माना जाता है। ऐसे आदेशों को शासनादेश भी कह सकते हैं। आदेश और कार्यालयीन आदेश प्रायः एक ही होते हैं। आदेश या कार्यालयीन आदेश का स्वरूप, कलेवर आदि सब समान हैं।
आदेश का नमूना/उदाहरण-
प्राध्यापक पदनाम सम्बन्धी आदेश
छत्तीसगढ़ शासन उच्च शिक्षा विभाग मन्त्रालय
क्रमांक : एफ. 9/1/.../2012/सी-3/38
भोपाल, दिनांक 12 फरवरी, 2012
राज्य शासन के निर्णयानुसार शासकीय एवं अशासकीय महाविद्यालयों के जिन शिक्षकों की नियुक्ति 1-1-2012 के पूर्व की है और प्रवर श्रेणी वेतनमान ₹ 37000- 57000 प्राप्त कर रहे हैं, उनको प्राध्यापक पद नाम दिया जाता है।
यह पदनाम, उस तिथि से मान्य होगा, जिस तिथि को उन्हें 37000-57000 का वेतनमान दिया गया है। इन शिक्षकों का शैक्षणिक कार्यभार यथावत् रहेगा।
छत्तीसगढ़ के राज्यपाल के नाम से तथा आदेशानुसार।
हस्ताक्षर
(क, ख, ग)
उप-सचिव
छत्तीसगढ़ शासन उच्च्च शिक्षा विभाग
प्रश्न 4 .( क ) योग शक्ति पाठ का उद्देश्य बताईए ।
या
योग शक्ति पाठ का सारांश लिखिए ।
उत्तर- "योग शक्ति" पाठ का सारांश
"योग शक्ति" एक प्रेरणादायक पाठ है, जो योग के महत्व और उसकी चमत्कारी शक्तियों को उजागर करता है। इस पाठ में बताया गया है कि योग न केवल शारीरिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक शांति प्रदान करने में भी सहायक होता है।
सारांश:
योग एक प्राचीन भारतीय विधा है, जिसे ऋषि-मुनियों ने आत्म-साक्षात्कार और मानसिक शांति के लिए अपनाया था। यह न केवल शरीर को स्वस्थ रखता है, बल्कि मन को भी स्थिर और शांत बनाता है। नियमित रूप से योग करने से मनुष्य की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, जीवन में संतुलन आता है और व्यक्ति अधिक अनुशासित तथा संयमित बनता है।
योग के विभिन्न आसनों, प्राणायाम और ध्यान के अभ्यास से मनुष्य दीर्घायु, सक्रिय और ऊर्जावान बना रहता है। यह न केवल शारीरिक व्याधियों को दूर करता है, बल्कि मानसिक तनाव और अवसाद को भी कम करता है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ और तनाव भरी दिनचर्या में योग का विशेष महत्व है, क्योंकि यह मनुष्य को भीतर से सशक्त बनाता है।
निष्कर्ष:
"योग शक्ति" पाठ हमें यह सिखाता है कि योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि आत्मा और मन की शुद्धि का साधन भी है। योग से हम न केवल स्वस्थ और खुशहाल जीवन जी सकते हैं, बल्कि मानसिक शांति और आत्म-नियंत्रण भी प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए, हमें अपने जीवन में योग को अपनाना चाहिए और इसे अपनी दिनचर्या का अभिन्न अंग बनाना चाहिए।
( ख ) अनुवाद से आप क्या समझते है अनुवाद करतें समय किन किन बातों को ध्यान में रखना आवश्यक होता है, विस्तार पूर्वक समझाइए ।
या
अनुवाद से क्या तात्पर्य है अनुवाद के भेद को उदाहरण सहित समझाइए ।
उत्तर- अनुवाद के लिए अंग्रेजी में 'Translation' शब्द मिलता है। अनुवाद को 'भाषान्तरण' भी कहते हैं। एक भाषा में कही गई या लिखी गई विषय-वस्तु को किसी अन्य भाषा में मूल भाव के साथ अभिव्यक्त करना 'अनुवाद' कहलाता है।
जिस भाषा से अनुवाद किया जाता है, उसे 'स्रोत भाषा' कहते हैं तथा जिस भाषा से अनुवाद किया जाता है उसे 'लक्ष्य भाषा' कहते हैं। अनुवाद में लेखक के मूल भाव को लक्ष्य भाषा में पूर्ण-रूपेण प्रस्तुत किया जाता है। अनुवादक को उसमें अपनी ओर से कुछ भी घटाना या बढ़ाना नहीं चाहिए। अनुवादक को मूल भाव में परिवर्तन या परिवर्द्धन का अधिकार नहीं होता। उसे ईमानदारी के साथ स्रोत भाषा में व्यक्त भाव तथा विचार को लक्ष्य भाषा में प्रस्तुत करना होता है, ताकि लक्ष्य भाषा के पाठक लेखन के मूल भाव तथा विचारों से अवगत हो सकें। अनुवाद में विषय-वस्तु का केन्द्रीय भाव तथा उसका उद्देश्य ज्यों-का-त्यों सुरक्षित रहना चाहिए। इसीलिए अनुवाद को कला कहा जाता है।
अनुवाद के प्रकार सामान्यतः अनुवाद दो प्रकार का होता है-
a person saldom ons. All comes of its own
1. शब्दानुवाद तथा 2. भावानुवाद।
शब्दानुवाद शब्दानुवाद में स्रोत भाषा की विषय-वस्तु को लक्ष्य भाषा में शब्दशः अनूदित करने का प्रयास किया जाता है। शब्दानुवाद सामान्य प्रयोग के लिए किया जाता है। प्रायः बरा, रेल तथा सार्वजनिक स्थानों में विभिन्न प्रकार के निर्देशों हेतु हिन्दी-अंग्रेजी वाक्यों तथा वाक्यांशों का शब्दानुवाद ही लिखा रहता है। जैसे-फूल तोड़ना मना है। (Do not pluck flowers.)
भावानुवाद-भावानुवाद में शब्दशः अनुवाद नहीं होता। इसीलिए अनुवादक को यह सुविधा होती है कि वह स्रोत भाषा के मूल भाव को ग्रहण करके लक्ष्य भाषा में स्वतन्त्र रूप से अभिव्यक्ति कर सकता है। भावानुवाद में 'पठनीयता' का सर्वाधिक ध्यान रखा जाता है। अर्थात् यदि किसी कहानी या उपन्यास का अनुवाद किया जा रहा है तो उसकी कथा के प्रवाह में बाधा नहीं आनी चाहिए तथा कथा की पठनीयता बनी रहनी चाहिए।
श्रेष्ठ अनुवाद वही माना जाता है, जहाँ आवश्यकतानुसार शब्दानुवाद तथा भावानुवाद की शैली को अपनाया जाये। यदि अनुवाद पूरी तरह से शब्दशः होगा, तो अनुवाद में अस्वाभाविकता आ जायेगी। यदि मात्र भावानुवाद किया जाता है, तो अनुवाद की प्रमाणिकता संदिग्ध हो जाती है। श्रेष्ठ अनुवाद वही माना जाता है जिसमें स्वाभाविकता तथा प्रवाह के साथ-साथ रचना की वैज्ञानिक, तकनीकी तथा कानून से सम्बन्धित प्रमाणिकता भी सुरक्षित रहे।
विषय-सामग्री का अनुवाद इस प्रकार के अनुवाद में विषय-वस्तु की बोधगम्यता विशेष महत्वपूर्ण होती है। अनुवादक की शैली सरल तथा सुबोध होनी चाहिए, जिससे वह वैज्ञानिक तथा तकनीकी विषय सामग्री को पाठकों के लिए प्रेषणीय बना सके। इसी प्रकार कानून से सम्बन्धित अनुवाद में नियमों, अधिनियमों तथा धाराओं का अनुवाद करते समय बोधगम्यता तथा प्रमाणिकता का विशेष ध्यान रखना चाहिए, अन्यथा अर्थ का अनर्थ होने की सम्भावना बनी रहती है। इस प्रकार के अनुवाद में । शब्दानुवाद महत्वपूर्ण होता है तथा शब्द के चयन में विशेष सावधानी की आवश्यकता होती है। प्रायः द्वि-अर्थक शब्दों के उपयोग से बचना चाहिए। भारत सरकार के "वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग" तथा केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय द्वारा विभिन्न विषयों के पारिभाषिक शब्दों का हिन्दी अनुवाद तैयार किया गया है ।
अनुवाद के उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
1. अन्य भाषा के साहित्य, दर्शन तथा ज्ञान को विकसित कर आपस में विचार-विमर्श करना। इस प्रकार दो भाषाओं और साहित्य के मध्य परस्पर विचार-विमर्श करना।
2. अन्य भाषा के साहित्य से अपनी भाषा के साहित्य को समृद्ध एवं विकसित करना।
3. अन्य भाषा तथा उसकी शैलियों को समझकर विशेषताओं को अपनी भाषा में स्थान देना।
प्रश्न 5. ( क ) संस्कृत विविद्यता मानव की व्यवस्था नही वरन् विशेषता है, स्पष्ट कीजिए ।
या
सिद्ध कीजिए कि भारतीय संस्कृति विविधता में एकता विद्यमान है।
उत्तर - संस्कृति ही मनुष्य को पशु जगत के अन्य प्राणियों से भिन्न करती है। अतः पशु जगत् के सभी प्राणियों से मानव की भिन्नता की पहचान है उसकी संस्कृति। ईश्वर और प्रकृति ने मानव को ही कुछ ऐसे योगिताएँ व जैविकीय वरदान दिये हैं जिससे वह स्वयं हमेशा कुछ नया करता है। जबकि पशु जगत में ऐसा नहीं होता है। वह अपने व्यवहार को बदल सकते हैं और अपने अनुभवों और विचारों को भाषा के द्वारा समाज के अन्य लोगों तक आसानी से पहुँचा सकते हैं। मानव की इसी क्षमता के कारण प्रत्येक मानव की समाज की अपनी अलग पहचान है, मानव सदस्यों की अपनी अलग एक जीवन शैली होती है जो उनका जीवन निर्देशित करती है और जो स्वयं उसके पालनकर्ताओं द्वारा कभी-कभी परिवर्तित होती रहती है और मानव अपनी स्मरण शक्ति के कारण अपनी भूलों को सुधार सकता है। मानव जगत में सामाजिक सम्बन्धों की जटिलता होती है, जबकि पशु जगत में सामाजिक सम्बन्ध प्रायः निश्चित होते हैं।
प्रत्येक समाज की अपनी विशिष्ट संस्कृति होती है किसी भी समाज की जीवन शैली उसे उसके पूर्वजों से विरासत में मिली होती है और बाद में आने वाली पीढ़ी दर पीढ़ी को हस्तान्तरित होती रहती है। इस पूरी प्रक्रिया में संस्कृति के कई तत्व विद्यमान होते हैं जो आगे चलकर परम्परा बन जाते हैं। कुछ परम्पराएँ मान ली जाती हैं और कुछ को उपेक्षित कर दिया जाता है। या वे अपनी उपयोगिता समाप्त कर देते हैं और कुछ नये तत्व जोड़ लिये जाते हैं ये नये तत्व समाज के सदस्यों द्वारा आविष्कृत कर दिए जाते हैं या फिर बाहर की परम्पराओं को अपना लिया जाता है। इस प्रकार किसी भी समाज की संस्कृति भिन्न होती है। किसी एक समय-सीमा पर न केवल अन्य समाजों की संस्कृति से अलग होती है, और वह स्वयं अपने अतीत के स्वरूप से भी अलग होती है। परम्परा और परिवर्तन सभी संस्कृतियों के अभिन्न अंग होते हैं। संस्कृति एक विस्तृत धारणा मात्र है जिसमें हमारे जीवन के आविष्कार प्रथा, परम्पराएं, धर्म, प्रौद्योगिकी, विश्वास, लोक-रीतियाँ तथा खान-पान के ढंग आदि सभी चीजें आती हैं। परम्परा और संस्कृति सभी संस्कृतियों के अभिन्न अंग होते हैं।
विविधता मानव संस्कृति की विवशता नहीं विशेषता है। सारे संसार की सभ्यता एक काल्पनिक सम्बोध है। पूरे संसार में विभिन्न संस्कृतियों का समावेश होता है।
आधुनिकीकरण के प्रयोग से प्राचीनकाल से कई पुराने समाजों की संस्कृतिए । परिवर्तन की लहर उती है परन्तु उन्हीं संस्कृतियों की विशेष पहचान रही है जिनके अस्ति करवखतरा नहीं हुआ। विश्व में कभी भी एक संस्कृति का सपना कभी पूरा नहीं है सकता ये सभी जानते हैं कि जिस प्रकार एक निर्वहमान पर्यावरण के लिये जैविक विविधता अनिवार्य है उसी प्रकार सांस्कृतिक विविधता भी सामाजिक और राष्ट्री विकास और एकीकरण के लिये अपरिहार्य है। अब पर्यावरण और जीवन के ि सांस्कृतिक एकता जरूरी है।
प्रत्येक समाज अपनी संस्कृति से ही परिभाषित होता है जो उसे उसकी स्वरून पहचान बनाती है। संस्कृति को मानव समाज का अभिन्न अंग माना गया है। प्रत्येक समाज-चाहे वह छोटा हो या बड़ा, आधुनिक हो या प्राचीन, वर्तमान का हो य प्रागैतिहासिक, अपनी संस्कृति से ही परिभाषित होता है। समाज में आने वाला हर नग सदस्य-जन्म से या आप्रवास द्वारा उस समाज की संस्कृति में रंगा होता है और उसे के अनुरूप अपने को डालता है क्योंकि संस्कृति ही प्रत्येक शिशु को संस्कार देकर एक सामाजिक प्राणी बनाती है।
जन्म के समय प्रत्येक शिशु मात्र एक पशु के समान होता है। संस्कृति उसे संस्कार देती है और वह पशु से परिष्कृत होकर सामाजिक प्राणी बनता है। संस्कृति ही उसकी भाषा, उसकी वेश-भूषा, उसका भोजन और उसकी भावनाएँ एवं मूल्य निर्धारित करते है। इस दृष्टि से संस्कृति को अधिजैविक कहा जा सकता है।
मानव ही संस्कृति का जन्मदाता है, परन्तु सृष्टि इससे हटकर अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व बना लेती है। संस्कृति की सृष्टि कोई एक व्यक्ति नहीं कर सकता। न हो संस्कृति किसी एक काल-बिन्दु पर सृजित होती है। संस्कृति एक नदी की तरह है के अपने उद्गम से लेकर गंतव्य तक अपनी पहचान बनाये रखती है परन्तु मार्ग में निरना कई चीजें पीछे छोड़ आती है और कई नई चीजें जोड़ लेती है।
समाज शास्त्रीय अश्वों में संस्कृति समाज द्वारा सीखे हुए व्यवहार - प्रकारों की उस समग्रता को कहा जा सकता है जो किसी समाज की विशिष्ट पहचान बनाती है संस्कृति के अन्तर्गत मनुष्य को वही व्यवहार आते हैं जिन्हें मनुष्य समाज में रहकर मनुष्य एवं समाज से सीखता है। जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होती है। व्यवहा निरन्तरता को बनाये रखने में केवल मानव मात्र ही सक्षम है। वही तो ऐसा प्राणी। जिसके पास मस्तिष्क है, जिससे वह विचार मन्थन द्वारा सही-गलत का निर्णय भली भाँति ले सकता है और उसके पास भाषा एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा अपने गतिविधियों को दूसरों तक पहुँचा सकता है। इसीलिए वह बोधगम्य प्रतीकों का निर्माण कर सकता है।
लिखित समाजों की यह धरोहर पुस्तकों और दस्तावेजों में संचित है और इससे प्रकार वही इसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती है। पीढ़ी दर पीढ़ी जिसे "परम्परा " की संज्ञा माना जाता है।
प्रश्न 5. ( क ) किसी दुर्घटना की जांच का प्रतिवेदन तैयार कीजिए।
या
निमंत्रण पत्र कितने प्रकार के होते हैं किसी एक निमंत्रण पत्र का प्रारुप देकर समझाइए।
उत्तर- दंगे की घटना की जाँच के लिए गठित समिति द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदन- विगत 20 जनवरी, 2012 को लक्ष्मणपुर में हुए जातीय दंगे के कारणों के लिए एक समिति का गठन किया गया व आदेश दिया गया कि समिति 25 दिनों के अन्दर अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत करे। समिति में निम्नलिखित तीन सदस्य थे-
(1) न्यायमूर्ति श्री आनन्द प्रकाश, भूतपूर्व न्यायाधीश।
(2) श्री जॉन फ्रेंकलिन, प्रसिद्ध वकील व संसद सदस्य ।
(3) श्री वसीम मोहम्मद, शिक्षाशास्त्री व मनोवैज्ञानिक ।
समिति के तीनों सदस्यों ने पूरे लक्ष्मणपुर का दौरा किया तथा प्रत्येक प्रकार के स्रोतों से दंगे के कारणों का पता लगाया।
समिति के तीनों सदस्यों ने अपने जाँच कार्य में निम्नलिखित प्रक्रिया को अपनाया-
(क) दंगे के बारे में विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले 200 व्यक्तियों का साक्षात्कार लिया।
(ख) दंगा पीड़ित लोगों से भेंट करके दंगे के कारणों एवं स्थितियों के विषय में पूछताछ की।
(ग) पुलिस विभाग के लोगों से वस्तुस्थिति के बारे में पूछताछ की।
(घ) दंगा-पीड़ित इलाके से दंगे के दौरान पकड़े गये लोगों के बयान लिए।
(ङ) दंगे के घोषित तथा अघोषित कारणों से सम्बद्ध व्यक्तियों से पूछताछ की।
इस प्रकार प्राप्त हुए सूत्रों के आधार पर निर्धारित कारणों से सत्यापन हेतु पुनः एक बार पूछताछ, साक्षात्कार एवं बयानों की प्रक्रिया अपनाई गई। इस बार कुछ ऐसे लोगों से भी पूछताछ की गई, जो प्रत्यक्ष रूप से दंगे से संबद्ध न होकर परोक्ष रूप से इससे गहराई के साथ जुड़े हुए रहे हैं।
इन समस्त प्रयासों के परिणामस्वरूप जो तथ्य सामने आए हैं, वे इस प्रकार हैं-
(i) श्री डेविड 25वाँ मकान, तीसवाँ रास्ता तथा श्री हैदर 27वाँ मकान, पन्द्रहवाँ रास्ता कभी हमपेशे और दोस्त थे। तीन वर्ष पहले श्री डेविड की पुत्री मारिया और श्री हैदर के पुत्र अली के बीच उत्पन्न हुए प्रेम सम्बन्ध के कारण दोनों व्यक्तियों में परस्पर तनाव पैदा हो गया। छः महीनों तक दोनों पक्ष गुप्त रूप से एक-दूसरे को हानि पहुँचाने का प्रयास करते रहे। इसमें श्री डेविड का पलड़ा भारी रहा तथा उन्होंने व्यावसायिक नाकाबन्दी कर श्री हैदर के कारोबार को लगभग चौपट कर दिया। आर्थिक दबाव के फलस्वरूप हैदर को कुवैत जाना पड़ा, जहाँ उसे बहुत अच्छी नौकरी मिल गई। इस तरह मामला दब-सा गया।
एक वर्ष के बाद अली छुट्टियाँ मनाने आया और वापसी में मारिया को भी कुवैत ले गया, तो श्री डेविड बिफर उठे। उन्होंने श्री हैदर के ऊपर हर प्रकार से धावा बोल दिया। गुण्डों से उन्हें बुरी तरह पिटवाया और उनकी दुकान में आग लगवा दी। अंततोगत्वा श्री हैदर को शहर छोड़कर भागना पड़ा।
सात माह पहले अली ने कुवैत से तीन लाख रुपये अपने पिता को भेजे। धन बल के आते ही श्री हैदर में बदला लेने की भावना जाग उठी। उन्होंने बाहर से बड़ी संख्या में गुण्डों को एकत्रित किया और एक दिन श्री डेविड के ऊपर पुरजोर हमला बोल दिया। इस प्रकार दो व्यक्तियों की रंजिश दो सम्प्रदायों के झगड़े के रूप में उभर आई।
(ii) इधर नगरपालिका के चुनाव में श्री हैदर के नेतृत्व में उनके सम्प्रदाय के लोग एक पार्टी के साथ मैदान में उतरे तो श्री डेविड के नेतृत्व में दूसरे सम्प्रदाय वाले दूसरी पार्टी के सामने आए। साम्प्रदायिकता ने राजनैतिक पार्टियों की आड़ ले ली और दंगे को राजनैतिक रंग मिल गया।
(iii) दो सम्प्रदायों, फिर दो पार्टियों के विद्वेष में दोनों सम्प्रदायों में सम्बद्ध विदेशी राष्ट्रों ने अपने बोसम्प्रदायों के लिए गोपनीय ढंग से आर्थिक सहायताएँ आने लगीं। चूँकि राष्ट्रों ने भी योगदान दिया। कुवैत से अली ने नाता जोड़ा तो डेविड ने अमेरिका से गुहार विदेशी मुद्रा का आगमन हमारी आर्थिक व्यवस्था के लिए वरदान है. इसलिए शासकीय नीतियाँ भी इस टकराव को धार देने में सहायक रहीं। इस प्रकार दो व्यक्तियों का झगड़ा दो राष्ट्रों के बीच चलने वाले शीत युद्ध के रूप में बदल गया, जिसकी अभिव्यक्ति इस दंगे के रूप में हुई है।
(iv) दंगे में जिन हथियारों का प्रयोग हुआ, उनमें अधिकांशतः देशी ही थे, विदेशी हथियारों में केवल पिस्तौल का प्रयोग हुआ है, जिसकी तस्करी सरलता से हो सकती है।
(v) दंगे में कुल मिलाकर 7 आदमी मरे, 34 घायल हुए। मृतकों में 5 और घायलों में 17 स्थानीय नहीं थे, बल्कि बाहर से आए थे। इससे सिद्ध होता है कि दंगा करने वाले अधिकांश लोग भाड़े पर बाहर से लाए गए और दंगा सुनियोजित रूप से करवाया गया।
उपर्युक्त तथ्यों के प्रकाश में निम्नलिखित सिफारिशें की जाती हैं-
(क) दोनों सम्प्रदायों में सद्भाव बढ़ाने हेतु वरिष्ठ लोगों को आगे आना चाहिए।
(ख) विदेशों से पैसे की आमद को नियन्त्रित किया जाना चाहिए।
(ग) व्यक्तिगत मामलों को हल करने के लिए पुलिस को प्रारम्भ में ही ठोस कदम उठाना चाहिए था। अब पुलिस को सतर्क रहना चाहिए तथा कानून व व्यवस्था को बनाए रखने के लिए पैसे और राजनीति के दबाव में नहीं आना चाहिए।
(घ) दंगा-पीड़ित लोगों की सरकारी स्तर पर कोई सहायता नहीं करनी चाहिए।
इससे लोग दंगा करने वाले और कराने वाले दोनों को भूलकर सरकार को दोष देने लगते हैं। जनता को जाग्रत करना चाहिए कि वह दंगा करने वालों और कराने वालों के प्रति प्रतिरोधात्मक रुख अपनाए तथा सामूहिक रूप से इनका बहिष्कार करे।
उम्मीद है सरकार उपर्युक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए उचित कार्यवाही करेगी।
प्रतिवेदक :
(1) श्री आनन्द प्रकाश
(2) श्री जॉन फ्रेंकलिन
(3) श्री वसीम मोहम्मद
नोट :- उम्मीद आज का हिंदी भाषा विषय से आपको परिक्षा परिणाम का पुरा जानकारी प्राप्त हुआ होगा ।
NOTIFICATION : इसी तरह हम आपके लिए सरगुजा विश्वविद्यालय के सभी क्वेश्चन पेपर शॉर्ट इसी तरह पोस्ट के माध्यम से आप तक पहुंचाते रहेंगे ।
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Thanks for reading: Sarguja University Annual examination 2024-25 Hindi language Answer sheet Including , Sorry, my English is bad:)