आप विद्युत और चुम्बकीय घटनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे। हमारे दैनिक जीवन में विद्युत का महत्व स्पष्ट है।
हम जिन भौतिक सुविधाओं का आनन्द उठाते हैं और हमारे दैनिक जीवन में जो युक्तियाँ प्रयुक्त होती हैं वे सब ऊर्जा की उपलब्धता पर निर्भर करती हैं।
विद्युत ऊर्जा का विफलन इस बात को निश्चित रूप से स्पष्ट कर देता है कि हम इस पर कितने आश्रित है। विद्युत के बिना अंधेरा हो जाता है,
गर्मियों में पंखे, कूलर एवं वातानुकूलन यंत्र और जाड़ों में ऊष्मक (हीटर) गीजर आदि निष्क्रिय हो जाते हैं। इसी प्रकार इसके बिना रेडियो, टी.वी.. कम्प्यूटर, माइक्रोवेव्ज को संचालित नहीं किया जा सकता है।
पानी के पम्प काम करना बंद कर देते हैं, खेतों में सिचाई नहीं हो पाती। यहाँ तक कि विद्युत विफलन से रेल सेवाएँ भी प्रभावित होती हैं।
इसके अभाव में औद्योगिक इकाइयों में मशीनें नहीं चल सकतीं। संक्षेप में, जीवन एकदम ठप हो जाता है और इससे कभी-कभी सार्वजनिक रोष भी भड़क उठता है।
इसलिए विद्युत और चुम्बकीय घटनाओं का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है।
आप दो प्रकार के विद्युत आवेशों के बारे में पढ़ेंगे, और साथ ही अलग-अलग परिस्थितियों में उनका व्यवहार, उनमें कार्यरत बल एवं उनके चारों ओर दिक्-स्थान आदि का भी अध्ययन कर सकेंगे।
इसे यदि और स्पष्ट रूप से कहें तो हम भौतिकी की उस शाखा का अध्ययन करना चाहते हैं जो स्थिर आवेशों से संबंधित है। इस शाखा को विद्युत स्थैतिकी कहते हैं।
घर्षण विद्युत - प्राचीन यूनानियों को ईसा से 600 वर्ष पूर्व भी विद्युत और चुम्बकीय घटनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त थी। उन्होंन पाया कि कहरूवा (Amber) के टुकड़े को जब फर या ऊन से रगड़ते हैं
तो वह छोटे-छोटे परों को आकर्षित करने लगता हैं। ग्रीक भाषा में कहरूवा (Amber) के लिए इलेक्ट्रॉन (Electron) शब्द प्रयुक्त होता है,
जिससे इलेक्ट्रिसिटो (विद्युत) शब्द की व्युत्पत्ति हुई है।
आप आवेशों के अस्तित्व और उनके बीच लगने वाले बलों को दर्शाने के लिए एक सरल प्रयोग कर सकते हैं।
यदि आप अपने सूखे बालों में कघी करें तो पायेंगे कि कंघी छोटे कागज के टुकड़ों को अपनी ओर आकर्षित करने लगती है।
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आवेशों के बीच आकर्षण प्रत्याकर्षण बल (a) एक आवेशित रबड़ की छड़ दूसरी आवेशित रबड़ क छाड़ को प्रतिकर्षित करती है। समान आवेश (सजातीय आवेश) एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं।
(b) ए आवेशित रबड़ की छड़ एक आवेशित काँच की छड़ को आकर्षित करती है। असमान (विजातीय) आवेश एक-दूसर को आकर्षित करते हैं।
अब एक रबड़ की छड़ को ऊन से रगड़कर इन छड़ों के पास क्रमशः लाएँ। आप अवलोकित करेंगे कि-
1. जब एक आवेशित रबड़ की छड़ को एक निलंबित आवेशित रबड़ की छड़ के समीप लाते हैं, तो प्रतिकर्षण दर्शाते हैं. [चित्र 15.(a)]
2. जब एक आवेशित रबड़ की छड़ को एक निर्लोबत आवेशित काँच की छड़ के पास लाते हैं, तो वे आकर्षण हैं। इसी प्रकार के परिणाम एक आवेशित काँच की छड़ को पास लाने पर भी प्राप्त होंगे-
इन प्रेक्षणों के आधार पर हम कह सकते हैं कि-
* एक आवेशित रबड़ की छड़ एक आवेशित काँच की छड़ को आकर्षित करती है और आवेशित रबड़ की छड़ को प्रतिकर्षित करती है।
* एक आवेशित काँच की छड़ दूसरी काँच की आवेशित छड़ को प्रतिकर्षित करती है लेकिन रबड़ की छड़ को आकर्षित करती है।
उपर्युक्त क्रियाकलापों से हम अनुमान लगा सकते हैं कि रबड़ की छड़ ने एक प्रकार की विद्युत प्राप्त की और काँच की छड़ ने दूसरी प्रकार की।
इसके अतिरिक्त सजातीय आवेश एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं और विजातीय आवेश एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं।
बेंजामिन (बेंजामिन फ्रेंकलिन, 1706-1790) ने सुझाव दिया कि काँच की छड़ पर आवेश को धनात्मक और की छड़ पर आवेश को ऋणात्मक कहा जाए।
यह चिह्न परंपरा तभी से चली आ रही है। एक बार एक वस्तु घर्षण द्वारा आवेशित हो जाती है, तो इसकी सहायता से दूसरी चालक वस्तुओं को दो विधियों से आवेशित किया जा सकता है ।
(1) चालन द्वारा अर्थात् एक आवेशित वस्तु को अनावेशित बस्तु से स्पर्श कराकर
(2) प्रेरण द्वारा अर्थात् एक आवेशित बस्तु को अनावेशित बस्तु के समीप लाकर और इसे भूसंपर्कित (earthing) करके तथा एक साथ आवेशित बस्तु और भूसंपर्क को हटा कर।
क्रियाकलाप 5.1 में आपने देखा कि जब एक काँच की छड़ को रेशम से रगड़ा जाता है. तो छड़ धनावेशित हो जाती है और रेशम ऋणावेशित हो जाता है। चूँकि दोनों वस्तुएँ सामान्य स्थिति में उदासीन (आवेश रहित) हैं अतः काँच की छड़ का धनावेश व रेशम में ऋणावेश परिमाण में बराबर होने चाहिए।
अर्थात् तंत्र (काँच रेशम) का कुल आवेश संरक्षित रहता है। न तो यह उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट। यह केवल तंत्र (काँच रेशम) की एक वस्तु से दूसरी वस्तु में स्थानांतरित होता है।
आवेश का स्थानांतरण तंत्र की तापीय ऊर्जा में वृद्धि के कारण होता है। काँच की छड़ में कम मजबूती से जुड़े इलेक्ट्रॉन रेशम की ओर स्थानांतरित होते हैं। काँच की छड़ (इलेक्ट्रॉनों की कमी के कारण) धनावेशित हो जाती हैं और रेशम इलेक्ट्रॉनों की अधिकता के कारण ऋणावेशित हो जाती है।
जब रबड़ को फर से रगड़ा जाता है, तो फर से इलेक्ट्रॉन रबड़ की ओर स्तानांतरित होते हैं. अर्थात् रबड़ ऋणावेश प्राप्त करता है और फर समान मात्रा का धनादेश प्राप्त करता है। धनावेश और ऋणवेश के अलावा और कोई आवेश आज तक नहीं पाया गया ।
1909 में मिलिकन (रॉबर्ट मिलिक, 1886-1953) ने प्रयोग द्वारा यह सिद्ध किया कि अपं आवेश एक निश्चित न्यूनतम आवेश (मूलभूत मात्रक) का पूर्णाकी गुण होता है। यह मूलभूत कइले का आवेश है.
इसका मान 1.6x10¹⁹ कूलॉम है। इसका आप है कि किसी वस्तु का आवेश होतो Q-Ne की भांति लिया जा सकता है जहाँ एक पूर्णांक है और इलेक्ट्रॉन का आवेश है।
इसका अर्थ यह हु कि किसी आवेशित वस्तु में 25 या 6.4 मात्रा का आवेश नहीं हो सकता। मिलिकॉन के समय में कुछ प्रोन में यह दर्शाया गया कि आवेश इलेक्ट्रॉन में और प्रोटॉन में होता है।
न्यूट्रॉन में कोई आवेश नहीं होता है। प्रत्येक परमाणु में समान संख्या में इलेक्ट्रॉन और प्रोट्रॉन होते हैं और इसलिए यह उदासीन होता है।
• प्रकृति में केवल दो प्रकार के आवेश पाए जाते है-धनात्मक और ऋणात्मक।
• सजातीय आवेश एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं और विजातीय आवेश एक दूसरे को आकर्षित करते हैं।
• आवेश संरक्षित रहता है।
• आवेश क्वान्टमीकृत होता है।
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Thanks for reading: विद्युत आवेश एवं विद्युत क्षेत्र क्या है|What is the electrical charge and electric field?, Sorry, my English is bad:)