आज हम कविता का महत्व बताएंगे की कैसे कविता पढ़ते हैं उनका क्या-क्या महत्व होता है उनका कौन सा अधिक महत्व जानकारी रखते हैं इसके बारे में सब कुछ विस्तार से समझाइए ।
कविता का महत्व -
आपने अनुभव किया होगा कि यदि कभी आप अपनी बात को ठीक से अभीभक्त नहीं कर पाते या अधिक प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करना चाहते हैं और नहीं कर पाते, तब कविता की एक या दो पंक्तियां ही आपकी समस्या को आसान बना देती है । तुलसीदास की एक चौपाई अथवा बिहार के एक दोहे का जितना असर सुनने वाले पर होगा, शायद उतना असर एक कहानी सुनने से ना हो । कवि बिहारी द्वारा राजा जय सिंह को भेजे हुए एक दोहे का असर यह हुआ था कि वह अपनी नवविवाहिता पत्नी के मोह से मुक्त होकर राज्य की रक्षा के लिए निकल पड़े थे ।
इस प्रकार हम कविता के अवयवों को दो भागो में विभाजित करके देख सकते है-भावपक्ष तथा कला पक्ष
भावपक्ष
भावपक्ष कविता का वह पक्ष है जिसमें कवि का चिंतन, उसकी सोच तथा उसका संदेश होता है। इन्हें हम तीन प्रमुख रूपों में देखते हैं-कथ्य, रस तथा विचार-दृष्टि ।
कथ्य का अर्थ होता है कविता में कही गई बात। कविता के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है, उसका संदेश क्या है तथा कवि की भावनाओं के स्रोत क्या है और उन भावनाओं के पीछे कौन-सी बातें छिपी है। प्राचीनकाल में रस को कविता की आत्मा माना जाता था और तब कविता में रस का समावेश सप्रयास किया जाता था,
किंतु आधुनिक कविता में रस अपने आप कथ्य और भाषा के कौशल से उत्पन्न हो जाते हैं। कविता के अवय में आज भी रस का महत्त्वपूर्ण स्थान है। रस कविता के वे तत्त्व होते हैं, जो पाठक के अंदर सोये हुए स्थायी भाों को जगा कर कथ्य को ग्रहण कराने में सहायता पहुँबाते हैं तथा पाठक को भी कवि की मनःस्थिति तक पहुँचाने का प्रयास करते हैं।
यहाँ विचार-दृष्टि से मतलब है कि कवि का विचार स्रोत क्या है, यह किसी चिंतन परंपरा से प्रभावित है अथवा नहीं और यदि है तो उसके विचारों में कौन से मूल तत्त्व हैं जो पूर्ण चिंतन-परंपरा से उसके विचारों को जोड़ते अथवा अलग करते हैं। भावपक्ष कविता का आधार और सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष माना जाता है।
आप ऊपर पढ़ चुके हैं कि कविता में भावना प्रधान होती है और गद्य में विचार। इसीलिए भावपक्ष कविता का महत्त्वपूर्ण पक्ष होता है। इसे काव्य की आत्मा तक कहा गया है। काव्य के भावपक्ष मेंकल्पना भी एक प्रमुख अवयव है। जो चीज वास्तव में होती नहीं है
किंतु कवि स्मरण कर या अपने सोब के आधार पर उसका चित्र खींच देता है वह कल्पना के द्वारा ही संभव हो पाता है। कई बार आपं पढ़ते होंगे कि दो चिड़ियों आपस में बात करती दिखाई जाती है। चिड़ियों का बोलना या बात करना कवि की कल्पना द्वारा रची गई चीज है।
कलापक्ष
कला पक्ष कविता का वह पक्ष होता है जिसके द्वारा कवि अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति करता है ।
इसमें कवि का शिल्पचातुर्य दिखाई देता है। कितने कलात्मक ढंग से और किन वस्तुओं के उत्कृष्ट प्रयोग से कवि ने अपनी बात को अभिव्यक्त करने की कोशिश की है,
वह कलापक्ष के अंतर्गत दिखाई देता है। कलापक्ष में भाषा-शैली, छंद, अलंकार आदि प्रमुख तत्त्व होते हैं। आइए, अब हम इन प्रमुख तत्त्वों का अलग-अलग विश्लेषण करते हैं-
भाषा शैली -
आपको ऊपर यह बात बारबार याद दिलाई गई है कि कविता की भाषा विशिष्ट होती है। कम-से-कम शब्दों और प्रवाहपूर्ण भाषा में कवि अपनी बातें कहता है
तो वह कविता का रूप ले लेती है। इस प्रकार कविता के कलापक्ष के अंतर्गत भाषा का बारीकी से अध्ययन किया जाता है क्योंकि इसी के माध्यम से वह बात स्पष्ट होती है, जो कवि ने कही है। भाषा को कवि ने किस कौशल और कलात्मकता के साथ परोसा है, वह कवि की शैली कही जाती है।
छंद -
कविता की भाषा प्रवाहमयी होती है। इसलिए कविता को प्राचीन समय में छंदों के माध्यम से रचा जाता था। छंद का अर्थ होता है
भाषा के लयात्मक रूप को एक निश्चित ढाँचे में बाँध कर रखना; जैसे-दोहा, चौपाई, सोरठा, सवैया आदि छंदों के भेद हैं। कुछ छंदों में मात्राओं की गणना की जाती है और कुछ छंदों को वर्षों की संख्या के आधार पर पहचाना जाता है। मात्रा के आधार पर रचे गए छंदों को 'मात्रिक छंद' तथा वर्षों के आधार पर रचे गए छंदों को 'वार्णिक छंद' कहते हैं।
हिंदी कविता में छायावाद युग के बाद छंदों का प्रचलन आवश्यक नहीं रह गया। अब आधुनिक समय में छंदों का प्रयोग कुछ कवि ही करते हैं। इसलिए छंद अब कविता का अवयव नहीं रहा है। आधुनिक कविता का स्वरूप मुक्त छंद हो गया है।
अलंकार-
प्राचीन कविता में भाषा के कौशल से कवि अलंकारों का स जन सप्रयास करते थे किंतु अब कवि अलंकारों पर अधिक ध्यान नहीं देते। लेकिन, कवि के भाषा कौशल तथा कथ्य की भंगिमा के कारण अलंकारों की सहज उत्पत्ति को रोका नहीं जा सकता। आज अलंकार कविता के महत्त्वपूर्ण अंग भले ही न हों, किंतु एक अवयव के रूप में अवश्य माने जाते हैं।
अन्य-
आधुनिक कविता में रस, छंद और अलंकारों का जानबूझ कर प्रयोग नहीं किया जाता है, किंतु कुछ ऐसे तत्त्व हैं जिन्हें जानबूझ कर भी कविता में लाने का प्रयास किया जाता है।
आधुनिक कविता में उन तत्त्वों का कौशलपूर्वक प्रयोग आसानी से देखा जा सकता है। इन तत्त्वों में मुख्य रूप से प्रतीक और बिंब का उल्लेख किया जा सकता है ।
क्या आप जानते हैं कि 'प्रतीक' किसे कहते हैं?
प्रतीक का अर्थ है किसी वस्तु के माध्यम से किसी अन्य वस्तु अथवा घटना से संबंधित बात का कहा जाना। उदाहरण के लिए आपने सूरदास का भ्रमरगीत सार पढ़ते समय गोपियों द्वारा बार-बार भ्रमर शब्द का प्रयोग जरूर पढ़ा होगा।
आप तो जानते हैं कि भ्रमर यानी भौरे का रंग काला होता है। उद्धव का रंग भी काला था और कृष्ण सॉवले। भौरे का स्वभाव है फूलों पर डोलते हुए रसपान करना। यानी प्रकारांतर से गोपियों भौरे के माध्यम से उद्धव पर व्यंग्य करती है और कुछ हद तक कृष्ण को भी उलाहना दे देती हैं। यहाँ भ्रमर प्रतीक के रूप में आया है ।
उसी प्रकार बिंब का अर्थ होता है परछाई अर्थात् भाषा कौशल के द्वारा किसी स्थिति का चित्र खींचा जाना। जब बात कहने पर चित्र स्पष्ट होने लगे तो उसे बिंब कहते हैं।
कई बार आप कविता पढ़ते समय ऐसा अनुभव करते होंगे कि जो बात कही जा रही है उससे कई बातों का आभास मिल रहा है। दूसरी स्थितियों और घटनाओं के भी चित्र आँखों के सामने उभरते चले जा रहे हैं। इसी भाषा कौशल को बिंब कहते हैं।
इस प्रकार उपर्युक्त सभी तत्त्व मिलकर कविता की रचना में सहयोग प्रदान करते है अतः कविता को पढ़ते समय इन सभी अवयवों पर ध्यान देना भी आवश्यक हो जाता है।
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Thanks for reading: कविता क्या है, पढ़ें यहां पुरी जानकारी हिंदी में |What is poetry, read the whole information here , Sorry, my English is bad:)