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धीरूभाई अंबानी और उनके उत्तराधिकारी मुकेश अंबानी, जिन्होंने भारतीय उद्योग को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।

    🔹 भूमिका : भारत व्यापार और उद्योग के क्षेत्र में दुनिया में अपनी अलग पहचान रखता है। इस पहचान को बनाने में कुछ महान उद्योगपतियों का अहम योगदान रहा है। उन्हीं में से एक हैं — धीरूभाई अंबानी और उनके उत्तराधिकारी मुकेश अंबानी, जिन्होंने भारतीय उद्योग को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। 🔹 धीरूभाई अंबानी का जीवन परिचय : धीरजलाल हीराचंद अंबानी का जन्म 28 दिसंबर 1932 को जूनागढ़ (गुजरात) में हुआ था। वे एक सामान्य परिवार से थे और छोटी उम्र में ही उन्होंने पेट्रोल पंप पर काम करना शुरू किया। लेकिन उनके भीतर बड़ा सपना और असीम मेहनत की ताकत थी। इसी लगन ने उन्हें रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड की स्थापना करने के लिए प्रेरित किया, जो आगे चलकर भारत की सबसे बड़ी कंपनी बनी। 🔹 मुकेश अंबानी : धीरूभाई अंबानी के बड़े पुत्र मुकेश धीरूभाई अंबानी का जन्म 19 अप्रैल 1957 को हुआ। मुकेश अंबानी ने अपने पिता के सपनों को न केवल आगे बढ़ाया बल्कि उन्हें कई गुना बड़ा बना दिया। उनकी नेतृत्व क्षमता और दूरदर्शी सोच के कारण आज रिलायंस इंडस्ट्रीज पेट्रोलियम, दूरसंचार, रिटेल, ऊर्जा और डिजिटल क्षेत्रों में विश्व-स्तर पर चमक...

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हिंदी साहित्य के वो तेजस्वी सूर्य हैं

हैलो दोस्तो आप सबका इस पोस्ट पर वेलकम आज हम रामधारी सिंह दिनकर के बारें में पढ़ेंगे एवं उनके लिखें हुए कविताएं भी पढ़ेंगे !  रामधारी सिंह 'दिनकर' — राष्ट्रीय कवि की गर्जना 🇮🇳✨ रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हिंदी साहित्य के वो तेजस्वी सूर्य हैं जिन्होंने अपने शब्दों से पूरे भारत को जागरूक किया। उनकी कविताएँ केवल पंक्तियाँ नहीं, बल्कि देशभक्ति, साहस और आत्मसम्मान की पुकार हैं। दिनकर जी को "राष्ट्रीय कवि" कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने अपनी कविताओं से आज़ादी की लड़ाई के समय भारतीय जनमानस में जोश और आत्मबल जगाया। उनकी रचनाएँ जैसे — 👉 “रश्मिरथी”, 👉 “परशुराम की प्रतीक्षा”, 👉 “हुंकार”, 👉 “सामधेनी”, आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा बनकर गूंजती हैं। --- 🔥 उनकी एक प्रसिद्ध कविता की झलक: > “हठ कर बैठा चांद एक दिन माता से यह बोला,सिलवा दे मां मुझे उन का मोटा एक झिंगोला " ये कविता कि एक लाईन हैं। सन् 1962 में जब बीन ने भारत पर आक्रमण किया था और उसमें हमारे देश की पराजय हुई थी, तो दिनकर का मन दुख से भर उठा। दिनकर राष्ट्रवादी क्रानि हैं। इस पराजय के लिए उन्होंने देश के राजनीतिक नेतृ...

Class1 to 3 tak baal pothi

बाल पोथी — रंग, सीख और खेल बाल पोथी रंग, सीख और छोटे-छोटे खेल — पहले वर्ष के बच्चों के लिए प्रस्तुति: आपका नाम / संस्थान पढ़ें, खेलें और छपाइए — पारंपरिक सीख का आधुनिक तरीका विषय-सूची अक्षर परिचय (क — अ) संख्याएँ (1 — 10) छोटी कहानी: "नन्हा मोती" कविता: "आओ मिलकर गाएँ" रंग भरो — चित्र लिखने की प्रैक्टिस पंक्तियाँ हिन्दी वर्णमाला — परिचय पहले कुछ अक्षर — हर अक्षर के साथ एक छोटा उदाहरण शब्द। माता-पिता से कहें कि बच्चों को बोलकर भी बताएं। अ अ — अनार आ आ — आम इ इ — इमली ई ई — ईख उ उ — उल्लू ऊ ऊ — ऊँट क क — केला ख ख — खरगोश ग ग — गाय घ घ — घड़ी नोट: आप और अक्षर व चित्र जोड़ सकते हैं — हर टाइल में छोटे चित्र लगाने से बच्चे जल्दी सीखते हैं। संख्याएँ 1 ...
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प्रयाग का गुप्त कोड: एक रिसर्च स्कॉलर और कवि की साज़िश एक रहस्यमय कहानी

प्रयागराज की रहस्यमय सुबह। रिसर्च स्कॉलर चंद्रकुमार कपूर, एक गुप्त निबंध और एक कवि के कोड में उलझा। क्या डॉक्टर शुक्ला का काम महज़ अकादमिक है |
अगर पुराने जमाने की नगर-देवता की और ग्राम-देवता की कल्पनाएँ आज भी मान्य होतीं तो में कहता कि इलाहाबाद का नगर-देवता जरूर कोई रोमेण्टिक कलाकार है। ऐसा लगता है कि इस शहर की बनावट, गठन, जिंदगी और रहन-सहन में कोई बँधे-बँधाये नियम नहीं, कहीं कोई कसाव नहीं, हर जगह एक स्वच्छन्द खुलाव, एक बिखरी हुई-सी अनियमितता। बनारस की गलियों से भी पतली गलियाँ और लखनऊ की सडक़ों से चौड़ी सडक़ें। यार्कशायर और ब्राइटन के उपनगरों का मुकाबला करने वाले सिविल लाइन्स और दलदलों की गन्दगी को मात करने वाले मुहल्ले। मौसम में भी कहीं कोई सम नहीं, कोई सन्तुलन नहीं। सुबहें मलयजी, दोपहरें अंगारी, तो शामें रेशमी! धरती ऐसी कि सहारा के रेगिस्तान की तरह बालू भी मिले, मालवा की तरह हरे-भरे खेत भी मिलें और ऊसर और परती की भी कमी नहीं। सचमुच लगता है कि प्रयाग का नगर-देवता स्वर्ग-कुंजों से निर्वासित कोई मनमौजी कलाकार है जिसके सृजन में हर रंग के डोरे हैं।
                               
और चाहे जो हो, मगर इधर कार, कार्तिक तथा उधर वसन्त के बाद और होली के बीच के मौसम से इलाहाबाद का वातावरण नेस्टर्शियम और पेंजी के फूलों से भी ज्यादा खूबसूरत और आम के बीरों की खुशबू से भी ज्यादा महकदार होता है। सिविल लाइन्स हो या अल्फ्रेड पार्क, गंगातट हो या खुसरूबाग, लगता है कि हवा एक नटखट दोशीजा की तरह कलियों के आँचल और लहरों के मिजाज से छेडख़ानी करती चलती है। और अगर आप सर्दी से बहुत नहीं डरते तो आप जरा एक ओवरकोट डालकर सुबह-सुबह घूमने निकल जाएँ तो इन खुली हुई जगहों की फिजाँ इठलाकर आपको अपने जादू में बाँध लेगी। खासतौर से पी फटने के पहले तो आपको एक बिल्कुल नयी अनुभूति होगी। वसन्त के नये-नये मौसमी फूलों के रंग से मुकाबला करने वाली हल्की सुनहली, बाल-सूर्य की अँगुलियाँ सुबह की राजकुमारी के गुलाबी वक्ष पर बिखरे हुए भौंराले गेसुओं को धीरे-धीरे हटाती जाती हैं और क्षितिज पर सुनहली तरुणाई बिखर पड़ती है। एक ऐसी ही खुशनुमा सुबह थी, और जिसकी कहानी मैं कहने जा रहा हूँ, वह सुबह से भी ज्यादा मासूम युवक, प्रभाती गाकर फूलों को जगाने वाले देवदूत की तरह अल्फ्रेड पार्क के लॉन पर फूलों की सरजमीं के किनारे-किनारे घूम रहा था। कत्थई स्वीटपी के रंग का पश्मीने का लम्बा कोट, जिसका एक कालर उठा हुआ था और दूसरे कालर में सरो की एक पत्ती बटन होल में लगी हुई थी, सफेद मक्खन जीन की पतली पेंट और पैरों में सफेद जरी की पेशावरी सैण्डिलें, भरा हुआ गोरा चेहरा और ऊँचे चमकते हुए माथे पर झूलती हुई एक रूखी भूरी लट। चलते-चलते उसने एक रंग-बिरंगा गुच्छा इकट्ठा कर लिया था और रह-रह कर वह उसे सूँघ लेता था। पूरब के आसमान की गुलाबी पाँखुरियाँ बिखरने लगी थीं और सुनहले पराग की एक बौछार सुबह के ताजे फूलों पर बिछ रही थी। “अरे सुबह हो गयी?” उसने चौंककर कहा और पास की एक बेंच पर बैठ गया। सामने से एक माली आ रहा था। “क्यों जी, लाइब्रेरी खुल गयी?” “अभी नहीं बाबूजी!” उसने जवाब दिया। वह फिर सन्तोष से बैठ गया और फूलों की पाँखुरियाँ नोचकर नीचे फेंकने लगा। जमीन पर बिछाने वाली सोने की चादर परतों पर परतें बिछाती जा रही थी और पेड़ों की छायाओं का रंग गहराने लगा था। उसकी बेंच के नीचे फूलों की चुनी हुई पत्तियाँ बिखरी थीं और अब उसके पास सिर्फ एक फूल बाकी रह गया था। हलके फालसई रंग के उस फूल पर गहरे बेंजनी डोरे थे।

“हलो कपूर!” सहसा किसी ने पीछे से कन्धे पर हाथ रखकर कहा, “यहाँ क्या झक मार रहे हो सुबह-सुबह?

उसने मुडक़र पीछे देखा, “आओ, ठाकुर साहब! आओ बैठो यार, लाइब्रेरी खुलने का इन्तजार कर रहा हूँ।

क्यों, यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी चाट डाली, अब इसे तो शरीफ लोगों के लिए छोड़ दो!

हाँ, हाँ, शरीफ लोगों ही के लिए छोड़ रहा हूँ; डॉक्टर शुक्ला की लड़की हे न, वह इसकी मेम्बर बनना चाहती थी तो मुझे आना पड़ा, उसी का इन्तजार भी कर रहा

हू”

“डॉक्टर शुक्ला तो पॉलिटिक्स डिपार्टमेंट में हैं?”

“नहीं, गवर्नमेंट साइकोलॉजिकल ब्यूरो में।”

“और तुम पॉलिटिक्स में रिसर्च कर रहे हो?”

“नहीं, इकनॉमिक्स में!”

“बहुत अच्छे! तो उनकी लड़की को सदस्य बनवाने आये हो?” कुछ अजब स्वर में ठाकुर ने कहा। “छिः।” कपूर ने हँसते हुए, कुछ अपने को बचाते हुए कहा, “यार, तुम जानते हो कि मेरा उनसे कितना घरेलू सम्बन्ध है। जब से में प्रयाग में हूँ, उन्हीं के सहारे हूँ और आजकल तो उन्हीं के यहाँ पढ़ता-लिखता भी हूँ...।”

ठाकुर साहब हँस पड़े, “अरे भाई, में डॉक्टर शुक्ला को जानता नहीं क्या? उनका-सा भला आदमी मिलना मुश्किल है। तुम सफाई व्यर्थ में दे रहे हो।”

ठाकुर साहब यूनिवर्सिटी के उन विद्यार्थियों में से थे जो बरायनाम विद्यार्थी होते हैं और कब तक वे यूनिवर्सिटी को सुशोभित करते रहेंगे, इसका कोई निश्चय नहीं। एक अच्छे-खासे रुपये वाले व्यक्ति थे और घर के ताल्लुकेदार। हॅसमुख, फब्तियाँ कसने में मजा लेने वाले, मगर दिल के साफ, निगाह के सच्चे। बोले

“एक बात तो मैं स्वीकार करता हूँ कि तुम्हारी पढ़ाई का सारा श्रेय डॉ. शुक्ला को है! तुम्हारे घर वाले तो कुछ खर्चा भेजते नहीं?”

“नहीं, उनसे अलग ही होकर आया था। समझ लो कि इन्होंने किसी-न-किसी बहाने मदद की है।”

“अच्छा, आओ, तब तक लोटस-पोंड (कमल-सरोवर) तक ही घूम लें। फिर लाइब्रेरी भी खुल जाएगी!”

दोनों उठकर एक कृत्रिम कमल-सरोवर की ओर चल दिये जो पास ही में बना हुआ था। सीढियाँ चढक़र ही उन्होंने देखा कि एक सज्जन किनारे बैठे कमलों की ओर एकटक देखते हुए ध्यान में तल्लीन हैं। छिपकली से दुबले-पतले, बालों की एक लट माथे पर झूमती हुई-

“कोई प्रेमी हैं, या कोई फिलासफर हैं, देखा ठाकुर?”

“नहीं यार, दोनों से निकृष्ट कोटि के जीव हैं-ये कवि हैं। में इन्हें जानता हूँ। ये रवीन्द्र बिसरिया हैं। एम. ए. में पढ़ता है। आओ, मिलाएँ तुम्हें!”

ठाकुर साहब ने एक बड़ा-सा घास का तिनका तोडकर पीछे से चुपके-से जाकर उसकी गरदन गुदगुदायी। बिसरिया चोंक उठा-पीछे मुडक़र देखा और बिगड़ गया-”यह क्या बदतमीजी हे, ठाकुर साहब! में कितने गम्भीर विचारों में डूबा था।” और सहसा बड़े विचित्र स्वर में आँखें बन्द कर बिसरिया बोला, “आह! केसा मनोरम प्रभात है! मेरी आत्मा में घोर अनुभूति हो रही थी...।”

कपूर बिसरिया की मुद्रा पर ठाकुर साहब की ओर देखकर मुसकराया और इशारे में बोला, “हे यार शगल की चीज। छेड़ो जरा!”

ठाकुर साहब ने तिनका फेंक दिया और बोले, “माफ करना, भाई बिसरिया! बात यह है कि हम लोग कवि तो हैं नहीं, इसलिए समझ नहीं पाते। क्या सोच रहे थे तुम?” बिसरिया ने आँखें खोलीं और एक गहरी साँस लेकर बोला, “मैं सोच रहा था कि आखिर प्रेम क्या होता है, क्यों होता है? कविता क्यों लिखी जाती है? फिर कविता के संग्रह उतने क्यों नहीं बिकते जितने उपन्यास या कहानी-संग्रह?” “बात तो गम्भीर है।” कपूर बोला, “जहाँ तक मैंने समझा और पढ़ा है-प्रेम एक तरह की बीमारी होती है, मानसिक बीमारी, जो मोसम बदलने के दिनों में होती है, मसलन कार-कार्तिक या फागुन-चेत। उसका सम्बन्ध रीढ़ की हड्डी से होता है। और कविता एक तरह का सन्निपात होता हे। मेरा मतलब आप समझ रहे हैं, मि. सिबरिया?” “सिबरिया नहीं, बिसरिया?” ठाकुर साहब ने टोका। बिसरिया ने कुछ उजलत, कुछ परेशानी और कुछ गुस्से से उनकी ओर देखा और बोला, “क्षमा कीजिएगा, आप या तो फ्रायडवादी हैं या प्रगतिवादी और आपके विचार सर्वदा विदेशी हैं। में इस तरह के विचारों से घृणा करता हूँ... ।” कपूर कुछ जवाब देने ही वाला था कि ठाकुर साहब बोले, “अरे भाई, बेकार उलझ गये तुम लोग, पहले परिचय तो कर लो आपस में। ये हैं श्री चन्द्रकुमार कपूर, विश्वविद्यालय में रिसर्च कर रहे हें और आप हैं श्री रवीन्द्र बिसरिया, इस वर्ष एम. ए. में बैठ रहे हैं। बहुत अच्छे कवि हैं।” कपूर ने हाथ मिलाया और फिर गम्भीरता से बोला, “क्यों साहब, आपको दुनिया में और कोई काम नहीं रहा जो आप कविता करते हैं?” बिसरिया ने ठाकुर साहब की ओर देखा और बोला, “ठाकुर साहब, यह मेरा अपमान है, में इस तरह के सवालों का आदी नहीं हूँ।” और उठ खड़ा हुआ। “अरे बेठो-बेठो!” ठाकुर साहब ने हाथ खींचकर बिठा लिया, “देखो, कपूर का मतलब तुम समझे नहीं। उसका कहना यह है कि तुममें इतनी प्रतिभा है कि लोग तुम्हारी प्रतिभा का आदर करना नहीं जानते। इसलिए उन्होंने सहानुभूति में तुमसे कहा कि तुम और कोई काम क्यों नहीं करते। वरना कपूर साहब तुम्हारी कविता के बहुत शौकीन हैं। मुझसे बराबर तारीफ करते हैं।” बिसरिया पिघल गया और बोला, “क्षमा कीजिएगा। मैंने गलत समझा, अब मेरा कविता-संग्रह छप रहा है, में आपको अवश्य भेंट करूँगा।” और फिर बिसरिया ठाकुर साहब की ओर मुडक़र बोला, “अब लोग मेरी कविताओं की इतनी माँग करते हैं कि में परेशान हो गया हूँ। अभी कल त्रिवेणी' के सम्पादक मिले। कहने लगे अपना चित्र दे दो। मैंने कहा कि कोई चित्र नहीं है तो पीछे पड़ गये। आखिरकार मैंने आइडेण्टिटी कार्ड उठाकर दे दिया!” ह कपूर बोला, “मान गये आपको हम! तो आप राष्ट्रीय कविताएँ लिखते हैं “जब जैसा अवसर हो!” ठाकुर साहब ने जड़ दिया, “वैसे तो यह वारफ्रण्ट का कवि-

सम्मेलन, शराबबन्दी कॉन्फ्रेन्स का कवि-सम्मेलन, शादी-ब्याह का कवि-सम्मेलन,

साहित्य-सम्मेलन का कवि-सम्मेलन सभी जगह बुलाये जाते हैं। बड़ा यश है

इनका!”

बिसरिया ने प्रशंसा से मुग्ध होकर देखा, मगर फिर एक गर्व का भाव मुँह पर लाकर

गम्भीर हो गया।

कपूर थोड़ी देर चुप रहा, फिर बोला, “तो कुछ हम लोगों को भी सुनाइए न!”

“अभी तो मूड नहीं है।” बिसरिया बोला।

ठाकुर साहब बिसरिया को पिछले पाँच सालों से जानते थे, वे अच्छी तरह जानते थे

कि बिसरिया किस समय और केसे कविता सुनाता है। अत: बोले, “ऐसे नहीं कपूर,

आज शाम को आओ। ज़रा गंगाजी चलें, कुछ बोटिंग रहे, कुछ खाना-पीना रहे तब

कविता भी सुनना!”

कपूर को बोटिंग का बेहद शोक था। फौरन राजी हो गया और शाम का विस्तृत

कार्यक्रम बन गया।

इतने में एक कार उधर से लाइब्रेरी की ओर गुजरी। कपूर ने देखा और बोला,

“अच्छा, ठाकुर साहब, मुझे तो इजाजत दीजिए। अब चलू लाइब्रेरी में। वो लोग आ

गये। आप कहाँ चल रहे हैं?”

“में ज़रा जिमखाने की ओर जा रहा हूँ। अच्छा भाई, तो शाम को पक्की रही।”

“बिल्कुल पक्की!” कपूर बोला और चल दिया।

ठ के पोर्टिको में कार रुकी थी और उसके अन्दर ही डॉक्टर साहब की लड़की ठी थी।

“क्यों सुधा, अन्दर क्यों बैठी हो?”

“तुम्हें ही देख रही थी, चन्दर।” और वह उतर आयी। दुबली-पतली, नाटी-सी,

Le लड़की, बहुत सुन्दर नहीं, केवल सुन्दर, लेकिन बातचीत में बहुत

दुलारी।

“चलो, अन्दर चलो।” चन्दर ने कहा।

वह आगे बढ़ी, फिर ठिठक गयी और बोली, “चन्दर, एक आदमी को चार किताबें

मिलती हैं?”

“हाँ! क्यों?”

“तो...तो...” उसने बड़े भोलेपन से मुसकराते हुए कहा, “तो तुम अपने नाम से मेम्बर

बन जाओ और दो किताबें हमें दे दिया करना बस, ज्यादा का हम क्या करेंगे?”

“नहीं!” चन्दर हँसा, “तुम्हारा तो दिमाग खराब है। खुद क्यों नहीं बनतीं मेम्बर?” “नहीं, हमें शरम लगती है, तुम बन जाओ मेम्बर हमारी जगह पर।” “पगली कहीं की!” चन्दर ने उसका कन्धा पकडक़र आगे ले चलते हुए कहा, “वाह रे शरम! अभी कल ब्याह होगा तो कहना, हमारी जगह तुम बैठ जाओ चन्दर! कॉलेज में पहुँच गयी लड़की; अभी शरम नहीं छूटी इसकी! चल अन्दर!” और वह हिचकती, ठिठकती, झेंपती और मुड़-मुडक़र चन्दर की ओर रूठी हुई निगाहों से देखती हुई अन्दर चली गयी। थोड़ी देर बाद सुधा चार किताबें लादे हुए निकली। कपूर ने कहा, “लाओ, में ले लूँ! तो बाँस की पतली टहनी की तरह लहराकर बोली, “सदस्य मैं हूँ। तुम्हें क्यों दूँ किताबें?” और जाकर कार के अन्दर किताबें पटक दीं। फिर बोली, “आओ, बैठो चन्दर!

में अब घर जाऊँगा।

ऊँहूँ, यह देखो!” और उसने भीतर से कागजों का एक बंडल निकाला और बोली

देखो, यह पापा ने तुम्हारे लिए दिया है। लखनऊ में कॉ्फ्रेन्स है न। वहीं पढने के लिए यह निबन्ध लिखा है उन्होंने। शाम तक यह टाइप हो जाना चाहिए। जहाँ संख्याएँ हें वहाँ खुद आपको बैठकर बोलना होगा। और पापा सुबह से ही कहीं गये हैं। समझे जनाब!” उसने बिल्कुल अल्हड़ बच्चों की तरह गरदन हिलाकर शोख स्वरों में कहा। कपूर ने बंडल ले लिया और कुछ सोचता हुआ बोला, “लेकिन डॉक्टर साहब का हस्तलेख, इतने पृष्ठ, शाम तक कौन टाइप कर देगा?” “इसका भी इन्तजाम है,” और अपने ब्लाउज में से एक पत्र निकालकर चन्दर के हाथ में देती हुई बोली, “यह कोई पापा की पुरानी ईसाई छात्रा है। टाइपिस्ट। इसके घर मैं तुम्हें पहुँचाये देती हूँ। मुकर्जी रोड पर रहती है यह। उसी के यहाँ टाइप करवा लेना और यह खत उसे दे देना।”

लेकिन अभी मैंने चाय नहीं पी।

समझ गये, अब तुम सोच रहे होगे कि इसी बहाने सुधा तुम्हें चाय भी पिला देगी। सो मेरा काम नहीं हे जो में चाय पिलाऊँ? पापा का काम है यह! चलो, आओ! चन्दर जाकर भीतर बैठ गया और किताबें उठाकर देखने लगा, “अरे, चारों कविता की किताबें उठा लायी-समझ में आएँगी तुम्हारे? क्यों, सुधा?” “नहीं!” चिढ़ाते हुए सुधा बोली, “तुम कहो, तुम्हें समझा दें। इकनॉमिक्स पढने वाले क्या जानें साहित्य?” “अरे, मुकर्जी रोड पर ले चलो, ड्राइवर!” चन्दर बोला, “इधर कहाँ चल रहे हो?” “नहीं, पहले घर चलो!” सुधा बोली, “चाय पी लो, तब जाना!” “नहीं, मैं चाय नहीं पिऊँगा।” चन्दर बोला।
                               
“चाय नहीं पिऊँगा, वाह! वाह!” सुधा की हँसी में दूधिया बचपन छलक उठा-”मुँह तो सूखकर गोभी हो रहा है, चाय नहीं पिएँगे।”

बंगला आया तो सुधा ने महराजिन से चाय बनाने के लिए कहा और चन्दर को स्टडी रूम में बिठाकर प्याले निकालने के लिए चल दी।

स्टडी रूम में, जहाँ डॉक्टर शुक्ला के गंभीर कागज़ात और मोटी किताबें रखी थीं, चन्दर कपूर बेचैनी से बैठा था। उसके हाथ में डॉक्टर शुक्ला का निबंधों का बंडल था—लगभग पचास पृष्ठों की लंबी पाण्डुलिपि।
चन्दर ने बंडल को पलटा। डॉक्टर साहब की लेखन शैली को पढ़ना हमेशा एक चुनौती थी; ऐसा लगता था जैसे अक्षरों में भी दर्शनशास्त्र का गूढ़ रहस्य छिपा हो। “इतने कम समय में... और वह भी उनके हस्तलेख से!” चन्दर ने फुसफुसाया।
बाहर से सुधा की मीठी हँसी सुनाई दी, जो महराजिन से चाय के लिए कह रही थी। उसकी चंचलता और मासूमियत उस गंभीर वातावरण में एक हल्की, गुलाबी धूप की तरह थी।
तभी, चन्दर की नज़र मेज के एक कोने पर रखे खुले टाइपराइटर पर पड़ी। टाइपराइटर पर कागज़ का एक टुकड़ा लगा हुआ था, जिस पर आधे-अधूरे टाइप किए गए कुछ शब्द थे।
"...यह आर्थिक-सामाजिक असमानता का मूल कारण है, और जब तक हम..."
यह डॉक्टर शुक्ला की लिखावट नहीं थी। चन्दर ने उत्सुकतावश कागज़ को खींचकर निकाल लिया। नीचे की तरफ, एक पतले, स्याही वाले पेन से कुछ लिखा था:
"कल शाम 8:00 बजे, वही पुराना स्थान। बहुत ज़रूरी है।"
- R.B.
"R.B.?" चन्दर के माथे पर बल पड़ गए। उसका दिमाग़ तुरंत सुबह की मुलाकात पर गया। रवीन्द्र बिसरिया (R.B.)! हाँ, वही कवि जो खुद को फ्रायडवादी कहे जाने पर नाराज़ हो गया था। क्या वह कविता की माँग से इतना परेशान था कि डॉक्टर शुक्ला के घर पर भी गुप्त संदेश भेजने लगा?
वह अभी इस पहेली को सुलझाने की कोशिश कर ही रहा था कि सुधा गरमा-गरम चाय और कुछ बिस्किट लेकर अंदर आई।
“तुम्हारी गोभी जैसी शक्ल के लिए स्पेशल चाय!” उसने ज़ोर से कहा और ट्रे मेज़ पर रखी।
चन्दर ने फ़ौरन वह टाइप किया हुआ नोट और पाण्डुलिपि को एक साथ छिपा लिया। "हाँ, हाँ, मेरी शक्ल का मज़ाक मत उड़ाओ। यह देखो, डॉक्टर साहब ने कितना काम थमा दिया है।"
सुधा ने चाय का कप उसके हाथ में दिया। "चन्दर, एक बात पूछूँ? सुबह अल्फ्रेड पार्क में तुम उस ठाकुर साहब और कवि के साथ क्या कर रहे थे? तुम तो इकोनॉमिक्स वाले हो और वो..."
"ओह, वो तो बस यूँ ही," चन्दर ने बात टालनी चाही। "वो ठाकुर साहब बड़े ही मज़ाकिया हैं, और वो कवि...बस थोड़े सनकी हैं। छोड़ो इन बातों को।"
सुधा ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखें झपकाईं। "नहीं, मुझे वो कवि पसंद नहीं आया। उसकी आँखों में कुछ अजीब सा था। जैसे वो कुछ छुपा रहा हो... या किसी साज़िश में हो।"
चन्दर मुस्कराया, "तुम हमेशा कहानी क्यों बनाने लगती हो? चलो, अब मुझे मुकर्जी रोड पहुँचना है। शाम को टाइपिंग पूरी करवानी है। मुझे उस टाइपिस्ट का पता और नाम बताओ।"
सुधा ने अपने ब्लाउज से वह पत्र निकाला और गंभीर होकर बोली, "सुनो, ईस्टर मेरी। पापा की पुरानी स्टूडेंट है। बहुत मेहनती है। पर वो बहुत एकांतप्रिय है, किसी से ज़्यादा मिलती-जुलती नहीं। पापा ने कहा है कि तुम्हें कोई भी बात उसके घर पर नहीं करनी है। सिर्फ काम सौंपना है और लौट आना है। पता है... मुकर्जी रोड पर रेलवे लाइन के पास एक पीला बंगला है, उसके सामने एक बहुत पुराना सरो का पेड़ लगा है। बस वहीं जाना है।"
चन्दर ने पत्र लिया, लेकिन उसका मन उस नोट और 'R.B.' के नाम पर अटका हुआ था। उसे महसूस हुआ कि प्रयाग की यह मनमौजी सुबह सिर्फ फूलों की महक और दोस्ती के ठहाकों से भरी नहीं है, बल्कि इसके नीचे गहरी गुत्थियाँ भी छिपी हैं।

चाय पीकर और डॉक्टर साहब के हिदायती नोट्स लेकर चन्दर कार में बैठ गया। ड्राईवर को मुकर्जी रोड पर पीले बंगले का पता बताकर उसने पाण्डुलिपि को फिर से देखा।
लगभग पंद्रह मिनट बाद, कार एक सुनसान गली में रुकी। सामने सचमुच एक पुराना, पीला प्लास्टर वाला बंगला था, जिसके गेट पर ज़ंग लगा हुआ था। उसके आँगन में एक ऊँचा, घना सरो का पेड़ खड़ा था, जिसकी पत्तियाँ उदास स्वर में हवा से बातें कर रही थीं।
चन्दर कार से उतरा। जैसे ही उसने गेट की ज़ंजीर खोली, एक पुरानी, कर्कश आवाज़ आई, जैसे बरसों से बंद दरवाज़ा खोला गया हो।
घर के भीतर भयानक शांति थी। उसने दरवाज़े पर दस्तक दी। थोड़ी देर बाद, दरवाज़ा खुला। सामने एक गंभीर मुद्रा वाली, सादे सफ़ेद लिबास में महिला खड़ी थी। उसकी आँखें तेज़ थीं, पर उनमें एक अजीब-सी विरक्ति का भाव था।
“मैं चन्दर हूँ। डॉक्टर शुक्ला ने भेजा है।” चन्दर ने खुद को परिचित कराया और पत्र बढ़ाया।
महिला, जो निस्संदेह ईस्टर मेरी थी, ने शांत भाव से पत्र लिया और अंदर चली गई, जैसे चन्दर का वहाँ होना एक पूरी तरह से सामान्य घटना हो। चन्दर को अंदर आने का औपचारिक निमंत्रण भी नहीं मिला। वह बस खड़ा रहा।
थोड़ी देर बाद, वह वापस आई। "डॉक्टर साहब का काम। हाँ।" उसने सिर्फ इतना कहा। "इसे शाम 7 बजे तक टाइप कर दूँगी। आप तब आ सकते हैं।"
"धन्यवाद," चन्दर ने कहा, "पर इसमें कुछ संख्याएँ हैं, जहाँ मुझे..."
"ज़रूरत नहीं है।" ईस्टर मेरी ने उसे बीच में ही काट दिया। "मैं समझ जाऊँगी। डॉक्टर शुक्ला का काम... मुझसे कोई चूक नहीं होती।" उसकी आवाज़ में एक अटूट विश्वास था। उसने डॉक्टर शुक्ला का बंडल लिया और दरवाज़ा लगभग तुरंत बंद कर दिया।
चन्दर बाहर निकला और कार में बैठ गया। उसका मन अब पूरी तरह से विचलित था।
एक तरफ रवीन्द्र बिसरिया का गुप्त नोट: "कल शाम 8:00 बजे, वही पुराना स्थान।"
दूसरी तरफ ईस्टर मेरी का एकांत और आत्मविश्वास, जिसने उसे सांख्यिकी की जाँच के लिए भी नहीं रोका।
और बीच में डॉक्टर शुक्ला की राजनीति और अर्थशास्त्र पर लिखी हुई पाण्डुलिपि, जो इतनी गोपनीय थी कि इसे एक एकांत टाइपिस्ट से करवाया जा रहा था।
चन्दर ने घड़ी देखी। शाम के 5 बजने वाले थे। अब उसे ठाकुर साहब से मिलना था और गंगा तट पर बोटिंग करनी थी।
उसने ड्राईवर से कहा, "पहले मुझे लॉटस पोंड ले चलो।"
जब वह अल्फ्रेड पार्क वापस लौटा, तो उसका दिल ज़ोर से धड़क रहा था। वह सीधा उस बेंच की ओर गया जहाँ वह सुबह बैठा था।
झुककर उसने ज़मीन से वह रवीन्द्र बिसरिया (R.B.) का नोट उठाया, जिसे उसने छिपा दिया था। नोट के पीछे स्याही का एक छोटा-सा धब्बा था।
चन्दर ने उस धब्बे को अपनी उँगली से रगड़ा। जैसे ही उसने ऐसा किया, स्याही का धब्बा फैल गया और उसके नीचे, बहुत हल्की पेंसिल से एक और पता लिखा हुआ दिखाई दिया:
"42, सिविल लाइन्स, राजनैतिक विज्ञान विभाग के पास।"
चन्दर चौंक गया। वही पुराना स्थान? यह जगह डॉक्टर शुक्ला के राजनैतिक विज्ञान विभाग के पास थी! और डॉक्टर शुक्ला ने तो कहा था कि वह गवर्नमेंट साइकोलॉजिकल ब्यूरो में हैं!
उसके दिमाग में घंटी बजी: यह कोई कविता या प्रेम का मसला नहीं है। यह कहीं अधिक गंभीर है।
"ठाकुर साहब! आज शाम को बोटिंग नहीं होगी।" चन्दर ने तुरंत फ़ोन निकाला। "आज हमें 7 बजे से पहले मुकर्जी रोड पहुँचना है... और ठीक 8 बजे हमें 42, सिविल लाइन्स जाना है।"
चन्दर ने महसूस किया कि प्रयाग के नगर-देवता ने अपनी स्वच्छंद अनियमितता में, उसे एक ऐसे खेल का हिस्सा बना दिया है जहाँ दाँव पर सिर्फ अर्थशास्त्र का रिसर्च नहीं, बल्कि कुछ और भी गंभीर और खतरनाक है।
नोट : आगे क्या होगा? क्या चन्दर ईस्टर मेरी से टाइपिंग समय से पहले करवा पाएगा? क्या वह 42, सिविल लाइन्स पर रवीन्द्र बिसरिया की गुप्त मीटिंग का पर्दाफाश कर पाएगा?
क्या आप जानना चाहेंगे कि चन्दर और ठाकुर साहब 42, सिविल लाइन्स पर क्या देखते हैं?

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Thanks for reading: प्रयाग का गुप्त कोड: एक रिसर्च स्कॉलर और कवि की साज़िश एक रहस्यमय कहानी , Sorry, my English is bad:)

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