सच्ची पूँजी
एक समय की बात है, किसी छोटे से गाँव में रामू नाम का एक गरीब कुम्हार रहता था। वह दिन-भर मिट्टी के सुंदर बर्तन बनाता, लेकिन उसकी कमाई बहुत कम थी। शहर के बड़े-बड़े कारखानों के बर्तनों के सामने उसके मिट्टी के घड़े कम ही बिक पाते थे।
एक दिन एक अमीर व्यापारी अपनी चमचमाती गाड़ी से वहाँ से गुजर रहा था। रास्ते में उसकी गाड़ी खराब हो गई। कड़ी धूप थी और उसे बहुत प्यास लगी थी। पास ही रामू की झोपड़ी थी। व्यापारी वहाँ गया और पानी माँगा। रामू ने बड़े प्रेम से उसे अपने मिट्टी के घड़े का शीतल जल पिलाया।
ठंडा पानी पीकर व्यापारी की आत्मा तृप्त हो गई। उसने रामू से कहा, "तुम्हारे इस घड़े के पानी में जो सुख और शीतलता है, वह मेरे घर के महँगे फ्रिज में भी नहीं है। तुम इसे शहर में क्यों नहीं बेचते?"
रामू ने विनम्रता से उत्तर दिया, "साहब, मैं तो बस अपनी मेहनत और प्रेम इस मिट्टी में मिलाता हूँ। लोग सामान की चमक देखते हैं, उसकी शुद्धता और बनाने वाले की मेहनत नहीं।"
व्यापारी को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने रामू के बनाए सारे घड़े खरीद लिए और शहर के बड़े होटलों में उन्हें 'प्राकृतिक शीतलता' के नाम से रखवाया। देखते ही देखते रामू के बर्तनों की माँग बढ़ गई।
सीख:
मेहनत और ईमानदारी से किया गया कार्य कभी व्यर्थ नहीं जाता। बाहरी चमक से ज्यादा वस्तु की गुणवत्ता और बनाने वाले का भाव मायने रखता है।
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Thanks for reading: Sachchi punji ak kahani, Sorry, my English is bad:)